लंबे समय से पिता को बीमारी ने घेर रखा है। उसने उन्हें सिकोड़कर एक कोने में पटक दिया है। वे उस कोने से ऊब चुके हैं, लेकिन वे अपनी आह किसी को नहीं सुनाते। शरीर के अलग-अलग हिस्सों में बीमारी ने अपनी कलाकारी कर रखी है| पिता पहले बहुत कम बोलते थे; हालाँकि जितना बोलते थे, उसमें दुनिया भर की उम्मीद झलकती थी।
बीमारी ने पिता को पुनर्जन्म दिया है। पिता कोने से रेंगते हुए दूर हो रहे हैं। वे बीमारी से रिहा नहीं हो सकते, लेकिन बंदिशों में बँधे होने के बावजूद आज़ाद कैसे रहा जा सकता है, इस पर शोध कर रहे हैं। वे स्वस्थ दिनों में बने तल्ख़ रिश्तों के सामने आलाप लगा रहे हैं। वे बीमारी को मात देने से ज़्यादा अपने भीतर बैठे अजीबोगरीब व्यक्ति को धराशायी करने निकले हैं।
पिता हर दिन नए नज़र आ रहे हैं — एक अजनबी की तरह, जिसमें कतई अजनबीयत नहीं होती।
पिता के पास बचपन के क़िस्से हैं। उनके कभी बच्चे होने का प्रमाण वे आजकल स्वयं प्रस्तुत कर रहे हैं। पिता अजीब लग रहे हैं; जो रेखाचित्र दिमाग में उजागर हो रहा है, वह कुछ अटपटा लग रहा है। अपने पिता को याद करते हुए वे किसी नन्हे बच्चे जैसे मालूम पड़ते हैं। पिता चहक रहे हैं, फुदक रहे हैं, और हम बार-बार ख़ुद को चुटकी नोचकर यकीन दिला रहे हैं कि यह कोई सपना नहीं, यथार्थ है। पिता का कभी बच्चा होना, ज़मीन में गड़े मुर्दे की तरह, बाहर आ रहा है।
बीमारी ने पिता को अथाह तकलीफ़ दी। अस्पताल के अनगिनत चक्कर लगे। हाथ दुआ में उठे तो उठे ही रहे। आँसू बहे तो रुके नहीं। और वे हर बार रणभूमि से विजयी लौटे। बीमारी ने बहुत कुछ छीना, लेकिन एक चीज़ हमें लौटाई, जो शायद सपने में भी नहीं मिलती—पिता का और अधिक पिता हो जाना। बीमारी ने हमें पिता लौटाए। पिता को हमारे नज़दीक और हमें पिता के बहुत नज़दीक लाकर खड़ा कर दिया। पुल ढह गया। परिवार बँध गया।

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