पिछले दो दिनों से मुस्तक़िल बारिश हो रही है। दो दिनों से चाँद बादलों में छुपकर बैठा है। ये दो दिन सर्दियों के आगमन का ऐलान कर रहे हैं। इन दो दिनों में घर छूट रहा है, इसका भी इल्हाम हो रहा है। चार दिन की ज़िंदगी में से दो दिन, इन दिनों घट रहे हैं। घर से निकलने के दिन भी क़रीब आ रहे हैं। खिड़की से बहती हवा में घुली यादें शीतल स्पर्श महसूस करा रही हैं और दरवाज़े से सितंबर प्रस्थान कर रहा है। उधर अक्टूबर शुरू हुआ, इधर ज़िंदगी में तब्दीलियाँ। घर छूटने का ख़याल ही बेचैन कर देता है, और जब सचमुच वह वक़्त क़रीब आता है, तो बेचैनी की पराकाष्ठा महसूस होने लगती है। घर अजनबी-सा लगने लगता है। हर कोने, हर हिस्से को देखते हुए ऐसा लगता है मानो उन्हें पहली बार देख रहे हों। चारों ओर ख़ामोशी बिखरी होती है। बचपन आँगन में पड़ा हुआ मिल जाता है। फूल भी मुरझाए हुए नज़र आने लगते हैं, और अपने लोग आपकी अनुपस्थिति के लिए ख़ुद को तैयार करते दिखाई देते हैं। आपका कमरा आपको कब्र के समान लगने लगता है। उसमें आपके बिताए हुए बरसों के सारे राज़ दफ़्न होते हैं—अकेलेपन में बिलखते हुए, दहाड़ मारकर हँसते हुए, ख़ुद को सँभालते हु...
आंधी, तूफ़ान और मूसलाधार बारिश से घिरा हुआ है पूर्वांचल। उमस के कारण चिड़चिड़ेपन में डूबा हुआ है पूर्वांचल। पूर्वांचल में अवश्य लोग ज़मीन पर चलते हैं, लेकिन उनकी बातें सातवें आसमान पर सैर-सपाटा करती हैं। सड़क पर गड्ढे, मुँह में गुटका और ज़बान पर क़िस्से। यहाँ हर पहला आदमी तीसरे आदमी को जानता है। “चार लोग क्या कहेंगे” कहने वाले वो चार लोग यहीं से आते हैं। चाय की टपरियों पर अपनी संसद चलती है। आने वाले चुनाव में किसका पलड़ा भारी है और पिछले चुनाव में फलाने कैसे हारे; इसका मूल्यांकन होता है। देश किस दिशा में जाएगा, हथेली पर तंबाकू मसलते हुए भविष्यवाणी की जाती है। अंधविश्वास का पव्वा चढ़ाकर, अपने बिस्तर पर खर्राटे मारते हुए, कल पर कायापलट करने का काम छोड़ दिया जाता है। यहाँ हर आदमी कहानीकार है। इन कहानीकारों को अक्सर बसों में पाया जा सकता है। ये बसें अपने आप में आठवाँ अजूबा हैं। ज़मीनी पायलट की अगर कोई श्रेणी होती, तो इनके ड्राइवर उसी में आते। ख़स्ता-हाल बसें, जो कभी भी दम तोड़ सकती हैं। उनके पुर्ज़े कभी भी खेतों में छितरा सकते हैं। मुझे अक्सर इन बसों में यात्रा करते हुए आठवीं कक्षा ...