बीती रात मौसम में एकदम तब्दीली आई। ठहरे हुए पत्ते नृत्य करने लगे; बिजली चमकी और फिर बारिश हुई। खिड़की के पास बिस्तर होने का एक फ़ायदा यह भी है कि बाहर के बदलते मौसम की रंगत के आप चश्मदीद हो सकते हैं। आजकल करने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन सोचने के लिए बहुत कुछ है। और आदमी जब सोचने पर आता है, तो भौचक्का कर देने वाले विचार खूब आते हैं। माज़ी में क्या-क्या किया, यह इत्मीनान से सोचता है और भविष्य के बुरे ख़यालों में वर्तमान गँवा देता है। एक नज़र में ख़ुद को ऐसे देखती हूँ कि ख़ुद पर केवल ग़ुस्सा आता है, और दूसरी ही नज़र में ख़ुद पर तरस। मुझे अक्सर ताज्जुब होता है कि अच्छी-से-अच्छी घटनाओं के बीत जाने के बाद भी हम उनमें गुंजाइश ढूँढ़ने लगते हैं कि वे और अच्छी हो सकती थीं। हो रही घटनाओं को लेकर हम कभी आश्वस्त नहीं होते। काश, हम केवल चश्मदीद होने की कोशिश करते, न कि हर वक़्त हक़ीक़त और काल्पनिकता का तराज़ू लेकर चलते। हम हर चीज़ का वज़न ढूँढ़ते रहते हैं। जिसका पलड़ा भारी होता है, उसी की तरफ़ रुख़ कर लेते हैं। मुझे संवाद करना बहुत पसंद है, लेकिन उन संवादों से ख़ौफ़ज़दा रहती हूँ जिनकी कोई आवाज़...
इस छोर पर खड़े होकर उस छोर तक पहुँचने की तीव्र इच्छा। इस छोर पर होते हुए लगता है कि यदि उस छोर तक नहीं पहुँचे, तो मानो प्रलय आ जाएगी; जीवन विलाप-गीत पर तांडव करने लगेगा। कुछ भी शेष नहीं बचेगा, और जो है, वह भी धराशायी हो जाएगा। उस छोर पर जैसे सब कुछ है और इस छोर पर कुछ भी नहीं—एकदम रिक्त। शायद यही मनुष्य की प्रवृत्ति है; उसके पास कितना ही क्यों न हो, उसे अपने अभावों का आभास अधिक होता है। पाँवों के नीचे फैली ज़मीन की कोई क़ीमत नहीं रह जाती। आसमान की महत्त्वाकांक्षाओं में आँखें ऐसी उलझती हैं कि अंततः धरती की धूल ही नसीब होती है। उस छोर तक पहुँचने की हड़बड़ी में साँसें कम ली जाती हैं और हाथ-पैर अधिक मारे जाते हैं। मानो पाँव किसी रस्सी से बँधे हों, और रस्सी का दूसरा सिरा तल में पड़े किसी भारी पत्थर से। हर प्रयास आगे बढ़ने का होता है, पर कोई अदृश्य बोझ लगातार नीचे खींचता रहता है। इस छोर पर रहते हुए इस छोर के सौंदर्य को नज़रअंदाज़ किया जाता है, और उस छोर की कोरी कल्पनाओं पर मंद-मंद मुस्कुराया जाता है। पर शायद नियति ने किसी तीसरे ही छोर तक पहुँचना लिखा है। और संभव है कि वहाँ पहुँचकर यह स...