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"दुबका मन"

 


जिन जगहों पर आप दोबारा नहीं जा सकते, उन्हीं जगहों पर बार-बार जाने को दिल करता है। काया पिंजरा है, लेकिन दिल आज़ाद परिंदा—ख़ुश-फ़हमी के झूठे दिलासों से भी ख़ुश हो जाता है। कभी-कभी मन सब कुछ त्याग देने का करता है। मन की चाह अक्सर मन के ही आड़े आ जाती है। मन बहुत कुछ नहीं माँगता, लेकिन जो माँगता है, वह संभावनाओं की मिट्टी से नहीं, ‘काश’ के मलबे से बना होता है।

इधर सर्दियों का ऐलान होता है, उधर दुबका मन इधर-उधर भागने को तैयार मिलता है। ज़ेहन अपने सारे बंद दरवाज़े खोल देता है। स्मृतियों की आवाजाही का ढिंढोरा पिटने लगता है। गड़े मुर्दे कब्र से निकलकर कोहरे में चलने लगते हैं। काया अपनी खोजबीन से ऊबकर बस दर्शक बन जाती है—एक पल भावुक और दूसरे ही पल कुपित।

मुझे सर्दियाँ अच्छी लगती हैं—यह मुझे पिछली सर्दियों में पता चला। दिन छोटे और रातें लंबी; दृष्टि पर लगाम और विचारों का लगातार हिनहिनाना। सर्दियों में कान उन हल्की आवाज़ों को भी सुनने लगते हैं जो भारी आवाज़ों के दाब के चलते कानों तक पहुँचने में असमर्थ रहती हैं। मेरी काँपती काया, बीती कई सर्दियों की गर्माहट के सहारे इन सर्दियों के बीतने का इंतज़ार कर रही है, और इस बीच मन सिसकियाँ ले रहा है—सब कुछ बीत जाने की कल्पना भर से।


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