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"पीछे छूटता घर, आगे आता घर"

लोग सोचते है कि शहर बसता है उनकी महत्वाकांक्षाओं   और उनके खालीपन से। वास्तव में  शहर बसता है, केवल ज़रूरतों से।  घर जहाँ आत्मीयता और शान्ति वास करती है वहां से निकल कर अनगिनत इमारतों को निहारते हुए जब रेलवे स्टेशन पंहुचा तब लगा कि मैं अकेले नहीं हूँ जो विस्थापन का शिकार हुआ| जब पता लगता है कि जो आप पे गुज़र रही है वो आपबीती हर रोज़ सैकड़ो लोगों के साथ गुज़रती है तो थोड़ा मन को ढाढ़स मिलता है| पर मन तो अटका था घर की चौखट पे जहाँ सुकून गले लगाता और अपनों के बीच अनबन का आना-जाना लगा रहता।  (गाड़ी नंबर 12003 प्लेटफार्म नंबर 6 पे लग चुकी है|)  मैं अपने सामान को उठता हूँ अपने कोच में चढ़ता हूँ और साथ में मेरे  ज़ेहन में एक ख्याल भी चढ़ा जिस तरह लोग अपने अपने कोच पे चढ़ते है| मुझे अपनी सीट तो मिल गयी पर अब तक बद्तमीज़ ख्याल ने सवाल की शक्ल ले ली| हालांकि सवाल आसान था कि एक मकान बनाने में कितने दिन और क्या-क्या सामान लगता है?  जेहन ने बिना सोचे जवाब दिया कि रकम और ज़्यादा से ज़्यादा कुछ साल और लाखों ईट, मौरंग, बालू, मज़दूर, मिस्त्री इत्यादि| जवाब का पूरा होना ही था कि प...