बीती रात मौसम में एकदम तब्दीली आई। ठहरे हुए पत्ते नृत्य करने लगे; बिजली चमकी और फिर बारिश हुई। खिड़की के पास बिस्तर होने का एक फ़ायदा यह भी है कि बाहर के बदलते मौसम की रंगत के आप चश्मदीद हो सकते हैं। आजकल करने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन सोचने के लिए बहुत कुछ है। और आदमी जब सोचने पर आता है, तो भौचक्का कर देने वाले विचार खूब आते हैं। माज़ी में क्या-क्या किया, यह इत्मीनान से सोचता है और भविष्य के बुरे ख़यालों में वर्तमान गँवा देता है। एक नज़र में ख़ुद को ऐसे देखती हूँ कि ख़ुद पर केवल ग़ुस्सा आता है, और दूसरी ही नज़र में ख़ुद पर तरस। मुझे अक्सर ताज्जुब होता है कि अच्छी-से-अच्छी घटनाओं के बीत जाने के बाद भी हम उनमें गुंजाइश ढूँढ़ने लगते हैं कि वे और अच्छी हो सकती थीं। हो रही घटनाओं को लेकर हम कभी आश्वस्त नहीं होते। काश, हम केवल चश्मदीद होने की कोशिश करते, न कि हर वक़्त हक़ीक़त और काल्पनिकता का तराज़ू लेकर चलते। हम हर चीज़ का वज़न ढूँढ़ते रहते हैं। जिसका पलड़ा भारी होता है, उसी की तरफ़ रुख़ कर लेते हैं। मुझे संवाद करना बहुत पसंद है, लेकिन उन संवादों से ख़ौफ़ज़दा रहती हूँ जिनकी कोई आवाज़...