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"अपने हिस्से का छोर"

 


इस छोर पर खड़े होकर उस छोर तक पहुँचने की तीव्र इच्छा। इस छोर पर होते हुए लगता है कि यदि उस छोर तक नहीं पहुँचे, तो मानो प्रलय आ जाएगी; जीवन विलाप-गीत पर तांडव करने लगेगा। कुछ भी शेष नहीं बचेगा, और जो है, वह भी धराशायी हो जाएगा। उस छोर पर जैसे सब कुछ है और इस छोर पर कुछ भी नहीं—एकदम रिक्त। शायद यही मनुष्य की प्रवृत्ति है; उसके पास कितना ही क्यों न हो, उसे अपने अभावों का आभास अधिक होता है।

पाँवों के नीचे फैली ज़मीन की कोई क़ीमत नहीं रह जाती। आसमान की महत्त्वाकांक्षाओं में आँखें ऐसी उलझती हैं कि अंततः धरती की धूल ही नसीब होती है। उस छोर तक पहुँचने की हड़बड़ी में साँसें कम ली जाती हैं और हाथ-पैर अधिक मारे जाते हैं। मानो पाँव किसी रस्सी से बँधे हों, और रस्सी का दूसरा सिरा तल में पड़े किसी भारी पत्थर से। हर प्रयास आगे बढ़ने का होता है, पर कोई अदृश्य बोझ लगातार नीचे खींचता रहता है। इस छोर पर रहते हुए इस छोर के सौंदर्य को नज़रअंदाज़ किया जाता है, और उस छोर की कोरी कल्पनाओं पर मंद-मंद मुस्कुराया जाता है।

पर शायद नियति ने किसी तीसरे ही छोर तक पहुँचना लिखा है। और संभव है कि वहाँ पहुँचकर यह सब बेतुका लगे; यह लगने लगे कि उस छोर तक न पहुँच पाना कोई त्रासदी नहीं था। तब समझ आए कि उस छोर तक पहुँचने की कोशिश में इस छोर का सब कुछ गँवा देना ही वास्तविक मूर्खता थी।

एक समय लगा था कि उस छोर को हथेली लगभग छू ही लेगी, लेकिन तभी पानी का बहाव विपरीत हो गया। शरीर बह गया, प्राण नहीं निकले। प्राण इतनी शीघ्र कहाँ निकलते हैं। जीवन बड़ा है, बहुत विशाल। वह एक असफलता, एक पराजय, या एक छूट गए किनारे से समाप्त नहीं होता।

ख़ैर, यह समझदारी बाद की बात है। अभी तो समूचा अस्तित्व धुंधला दिखाई दे रहा है। आसपास हो रही मूसलाधार बारिश से बचने के लिए छतरी की सामग्री इकट्ठा करनी चाहिए, पर हिम्मत नहीं हो रही है। एक अजीब-सी निराशा ने जकड़ रखा है। फिर भी कहीं न कहीं यह विश्वास शेष है कि अपने हिस्से की धूप खोजनी है, और अपने हिस्से का छोर भी।

~आमना 

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