पिछले दो दिनों से मुस्तक़िल बारिश हो रही है। दो दिनों से चाँद बादलों में छुपकर बैठा है। ये दो दिन सर्दियों के आगमन का ऐलान कर रहे हैं। इन दो दिनों में घर छूट रहा है, इसका भी इल्हाम हो रहा है। चार दिन की ज़िंदगी में से दो दिन, इन दिनों घट रहे हैं। घर से निकलने के दिन भी क़रीब आ रहे हैं। खिड़की से बहती हवा में घुली यादें शीतल स्पर्श महसूस करा रही हैं और दरवाज़े से सितंबर प्रस्थान कर रहा है। उधर अक्टूबर शुरू हुआ, इधर ज़िंदगी में तब्दीलियाँ। घर छूटने का ख़याल ही बेचैन कर देता है, और जब सचमुच वह वक़्त क़रीब आता है, तो बेचैनी की पराकाष्ठा महसूस होने लगती है। घर अजनबी-सा लगने लगता है। हर कोने, हर हिस्से को देखते हुए ऐसा लगता है मानो उन्हें पहली बार देख रहे हों। चारों ओर ख़ामोशी बिखरी होती है। बचपन आँगन में पड़ा हुआ मिल जाता है। फूल भी मुरझाए हुए नज़र आने लगते हैं, और अपने लोग आपकी अनुपस्थिति के लिए ख़ुद को तैयार करते दिखाई देते हैं। आपका कमरा आपको कब्र के समान लगने लगता है। उसमें आपके बिताए हुए बरसों के सारे राज़ दफ़्न होते हैं—अकेलेपन में बिलखते हुए, दहाड़ मारकर हँसते हुए, ख़ुद को सँभालते हु...