Skip to main content

"पिछले दो दिनों से"


पिछले दो दिनों से मुस्तक़िल बारिश हो रही है। दो दिनों से चाँद बादलों में छुपकर बैठा है। ये दो दिन सर्दियों के आगमन का ऐलान कर रहे हैं। इन दो दिनों में घर छूट रहा है, इसका भी इल्हाम हो रहा है। चार दिन की ज़िंदगी में से दो दिन, इन दिनों घट रहे हैं। घर से निकलने के दिन भी क़रीब आ रहे हैं। खिड़की से बहती हवा में घुली यादें शीतल स्पर्श महसूस करा रही हैं और दरवाज़े से सितंबर प्रस्थान कर रहा है। उधर अक्टूबर शुरू हुआ, इधर ज़िंदगी में तब्दीलियाँ।

घर छूटने का ख़याल ही बेचैन कर देता है, और जब सचमुच वह वक़्त क़रीब आता है, तो बेचैनी की पराकाष्ठा महसूस होने लगती है। घर अजनबी-सा लगने लगता है। हर कोने, हर हिस्से को देखते हुए ऐसा लगता है मानो उन्हें पहली बार देख रहे हों। चारों ओर ख़ामोशी बिखरी होती है। बचपन आँगन में पड़ा हुआ मिल जाता है। फूल भी मुरझाए हुए नज़र आने लगते हैं, और अपने लोग आपकी अनुपस्थिति के लिए ख़ुद को तैयार करते दिखाई देते हैं।

आपका कमरा आपको कब्र के समान लगने लगता है। उसमें आपके बिताए हुए बरसों के सारे राज़ दफ़्न होते हैं—अकेलेपन में बिलखते हुए, दहाड़ मारकर हँसते हुए, ख़ुद को सँभालते हुए, ज़मीन पर लोटते हुए और किसी सपने के पीछे भागते हुए बिताए गए वे तमाम लम्हें। आख़िर में, आपको अपने कमरे से ख़ुद को घसीटकर बाहर निकालना पड़ता है। नई जगह पर पाँव पसारने पड़ते हैं। नए सिरे से रहना शुरू करना पड़ता है। उछलती हुई घर की यादों को बार-बार शांत कराना पड़ता है। यह सब कैसे होगा, मुझे नहीं मालूम, लेकिन इतना यक़ीन है कि सब हो जाएगा, अपने वक़्त पर।

अम्मा अलमारी खोलकर बैठी हुई हैं और छाँटबीन जारी है। कपड़ों और ज़रूरत की चीज़ों का अंबार लगा हुआ है। मुझे 2019 के दिन याद आ रहे हैं, तब पहली बार घर से निकलना हुआ था। लेकिन आज के दिन भी पहली बार घर से निकलने का एहसास हो रहा है। इंसान कहीं भी जाए, अपने हिस्से का घर वह हमेशा अपने भीतर पालता है। ख़ैर! अब बचे हुए दो दिन क्या-क्या आश्चर्य लाते हैं, इसका इंतज़ार रहेगा।

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन,
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में।

~सीमाब अकबराबादी

Comments

Popular posts from this blog

"पिता और काश"

  पिता से संवाद गिनती के रहे। डर का दायरा लम्बा-चौड़ा रहा। सवालों से पिता को ख़ूब परेशान किया। जब सवाल का जवाब ख़ुद ढूँढना शुरू किया तो पिता की रोक-टोक बीच में आने लगी। पिता भयानक लगने शुरू हो गए। पिता खटकने लगे।  पिता ने उँगली पकड़ कर चलना सिखाया और लड़खड़ाने पर थाम लिया। घर से बाहर की दुनिया की पहली झलक भी पिता ने दिखाई। मेले का सबसे बड़ा झूला भी झुलाया; खेत घुमाया, शहर घुमाया, रेल की यात्रा कराई। फिर दुनिया के कुएं में अकेले धकेल दिया। पिता उस गांव जैसे थे जहाँ से एक सपनों की पगडंडी शहर की सड़क से जा मिलती थी। मुझे भी वह पगडंडी भा गयी। अच्छे जीवन की महत्वाकांक्षा ने पहुँचा दिया, शहर। पिता से दूर, पिता के ऊल-जलूल उसूलों से दूर।  शहर की दुनिया, गांव में बसी पिता की दुनिया को दर-किनार करने लगी। समय बीता, और इतना बीत गया कि पिता पुराने जैसे नहीं रहे।  एक लम्बे-चौड़े व्यक्ति का शरीर ढल गया। चाल में लड़खड़ाना जुड़ गया। आवाज़ धीमी हो गयी। दुनिया के सारे कोने की समझ रखने वाला व्यक्ति, अब एक कोने में सिमट गया। पिता इन दिनों बच्चे जैसे हो गए। अपने कामों के लिए दूस...

"दिल और दिल्ली"

दिल्ली से लौटने पर कितनी ही बार  पाँवों  को इस दृढ़ता के साथ झटका कि अब कहीं जाकर दिल्ली की गति  पाँवों   से निकलकर धूल में ओझल हो जाएगी। लेकिन दिल्ली की गति न तो  पाँवों  का दामन छोड़ रही है, न ही विचारों की उथल-पुथल को बख़्श रही है। महज़ बीस दिनों का ही रिश्ता रहा दिल्ली से, लेकिन यह मुट्ठी भर दिन घर पर बिताए गए दो वर्षों पर भारी पड़ रहे हैं। बड़े शहरों की एक अपनी पकड़ होती है। आप जितनी दूर जाते हैं, उस शहर की पकड़ का अंदाज़ा उतना ही अधिक होता है। बड़ा शहर आपकी चाल-ढाल को तब ही पनपने देता है, जब उसके कंक्रीट के जंगल की हवा और आपके सपनों की साँस लेने की इच्छा के बीच कोई समन्वय बनता है। इन शहरों की अपनी एक गति होती है, और पाँव अनायास ही उस गति में रंग जाते हैं। "समय कितना हो रहा है?" — यह जानने के लिए आपको अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखने की आवश्यकता नहीं होती। किसी भी चेहरे को देखकर समय का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मेट्रो में चढ़ते-उतरते हुए, छोटी जगहों की ख़ुशबू का भी आना-जाना लगा रहता है। किसी स्टेशन पर कोई सपना चढ़ता है और किसी पर दिनभर की थकान उतरती...

"दिवाली बीत गई"

  हर शोर-शराबे के बाद, दबे पाँव काट खाने दौड़ता हुआ सन्नाटा आता है। उत्सवों में चमक-दमक होती है, लोगों का साथ होता है, लेकिन उसके बाद रह जाता है — अकेलापन, जो दूर-दूर तक पसरा होता है। बेमन ही सही, लेकिन हम बार-बार उसी सन्नाटे की ओर लौटते हैं। मन जानता है कि संगत क्षणिक है और अकेलापन शाश्वत। अकेलेपन में यादों का रेला है, विचारों की भिड़ंत है और अंतहीन इंतज़ार है। बहुत सारे डर भी हैं, जिनसे आज नहीं तो कल आमना-सामना होना तय है। इस सबके बावजूद, आदमी अकेलेपन में कराहता नहीं है, मन ही मन मुस्कुराता है। दिन भर में इकट्ठा की गई ध्वनियों को गीत में बुनकर गुनगुनाता है। दिन भर हम अकेलेपन से भागते फिरते हैं — व्यस्तता का हाथ थामते हैं, नई-नई योजनाएँ बनाते हैं, पुरानी योजनाओं को तोड़ते-मरोड़ते हैं — और शाम होते-होते बस लौटने का मन करता है। कहाँ? शायद 'घर'। लेकिन एक बार घर से निकलने पर, वहाँ जाया तो जा सकता है, लौटा नहीं जा सकता। त्योहार मनाने से ज़्यादा, वे घर जाने के बहाने होते हैं — थोड़ी देर के लिए पाँवों की गति को विश्राम देने के लिए, जीवन की गंभीरता को कुछ समय के लिए ताबूत में बंद करन...