दिल्ली आना हुआ है। चेन्नई अब नया पता है। एक महीने पहले, दिल्ली में रहते हुए लग रहा था कि अगले पाँच साल दिल्ली की गलियों में गुज़रेंगे। क़िस्मत ने चेन्नई पहुँचा दिया। समंदर देखना हुआ। लहरों की अठखेलियाँ पहली दफ़ा देखीं। अनजान शहर में ख़ुद को भटकते हुए भी देखा। ज़बान को समझने की कोशिश की और हैरान-परेशान ख़ुद को बिना आँसुओं के सिसकते हुए भी पाया। पिछले पंद्रह दिनों में बहुत कुछ बदल गया। चीज़ें धीरे-धीरे बदलती हैं, लेकिन किसी एक झटके में एहसास होता है कि आप बदलाव की गिरफ़्त में हैं। बहुत-सी चीज़ें हम किसी भी तरह बदलना नहीं चाहते, लेकिन वक़्त का अपना एक उसूल है। वह चीज़ों को बदलता है और आपको आगे की दिशा में धकेलता है। किसी मोड़ पर सुस्ताने से लगता है कि कितने आगे आ गए हैं, और इतना आगे आ जाने पर हैरत भी होती है। बहुत कुछ छूटता है, जिसका स्पर्श आप लगातार बनाए रखना चाहते हैं। जीवन का सार छूटी हुई चीज़ों में ज़्यादा है। इस बार की आकस्मिक यात्रा ने दिल्ली से प्यार पर मुहर लगा दी। पहले कभी किसी को यह कहते सुनती थी कि उसे किसी शहर से प्यार है, तो लगता था कि यह कैसी बचकानी बात है! किसी को किस...