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"उनतीस जून"

 


बीती रात मौसम में एकदम तब्दीली आई। ठहरे हुए पत्ते नृत्य करने लगे; बिजली चमकी और फिर बारिश हुई। खिड़की के पास बिस्तर होने का एक फ़ायदा यह भी है कि बाहर के बदलते मौसम की रंगत के आप चश्मदीद हो सकते हैं।

आजकल करने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन सोचने के लिए बहुत कुछ है। और आदमी जब सोचने पर आता है, तो भौचक्का कर देने वाले विचार खूब आते हैं। माज़ी में क्या-क्या किया, यह इत्मीनान से सोचता है और भविष्य के बुरे ख़यालों में वर्तमान गँवा देता है। एक नज़र में ख़ुद को ऐसे देखती हूँ कि ख़ुद पर केवल ग़ुस्सा आता है, और दूसरी ही नज़र में ख़ुद पर तरस।

मुझे अक्सर ताज्जुब होता है कि अच्छी-से-अच्छी घटनाओं के बीत जाने के बाद भी हम उनमें गुंजाइश ढूँढ़ने लगते हैं कि वे और अच्छी हो सकती थीं। हो रही घटनाओं को लेकर हम कभी आश्वस्त नहीं होते। काश, हम केवल चश्मदीद होने की कोशिश करते, न कि हर वक़्त हक़ीक़त और काल्पनिकता का तराज़ू लेकर चलते। हम हर चीज़ का वज़न ढूँढ़ते रहते हैं। जिसका पलड़ा भारी होता है, उसी की तरफ़ रुख़ कर लेते हैं।

मुझे संवाद करना बहुत पसंद है, लेकिन उन संवादों से ख़ौफ़ज़दा रहती हूँ जिनकी कोई आवाज़ नहीं होती। वे बस भीतर उथल-पुथल मचाते रहते हैं। कहते हैं कि संवाद हमें बचा लेते हैं, लेकिन कभी-कभी कुछ संवाद हमें भीतर-ही-भीतर मार भी सकते हैं। सबसे कठिन संवाद शायद वही होते हैं जो किसी और से नहीं, ख़ुद से किए जाते हैं—जिनका कोई साक्षी नहीं होता, कोई जवाब नहीं होता, केवल एक लंबी ख़ामोशी होती है।

कभी-कभी हम इतने सतर्क होकर जीवन जीने लगते हैं कि जीना पीछे छूट जाता है। कुछ भी करने से पहले उसके हर संभावित नतीजे का हिसाब लगाने लगते हैं। क्या होगा, क्या नहीं होगा, क्या खो जाएगा और क्या मिल जाएगा—इन्हीं सवालों में उलझे रहते हैं। शायद इसी सावधानी में जीवन का सबसे सहज हिस्सा हमसे छूट जाता है। कुछ रास्ते केवल चलने से खुलते हैं; उनके हर मोड़ का अनुमान पहले से नहीं लगाया जा सकता।

आज जन्मदिन है। मेरे जैसे उत्साहहीन व्यक्ति के लिए यह बस एक आम दिन है। बहुत लोगों का स्नेह मिला। मुझे तो ख़ुद याद नहीं रहता कि कब उनतीस जून आती है और कब चली जाती है, लेकिन कुछ लोग कभी नहीं भूलते। वे हर साल रचनात्मक शुभकामनाएँ भेजते हैं, मेरे फीके जवाबों के बावजूद।

आज के दिन अक्सर अपनी लिखाई पर शक होता है—क्या लिखना वाक़ई मुझे आता है, या यह कोई जादुई सपना है, जिसके टूटते ही कलम की निब भी टूट जाएगी?

किसी बिंदी के मानिंद चाँद आसमान के ललाट से झाँक रहा है। रात का सुरूर धीरे-धीरे चढ़ रहा है। हालाँकि, यह पूरा दिन एक अजीब-सी उदासी की तहों में लिपटा गुज़र गया।

~आमना 

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