गुज़रे सालों में मेरे भीतर एक बदलाव घर कर गया है कि जिनसे मैं प्रेम करती हूँ, उनसे बिना किसी लाग-लपेट के यह कहना शुरू कर दिया है कि मुझे उनसे प्रेम है। कितना प्रेम है, इसकी व्याख्या भ्रमित करने वाली है। प्रेम का कोई मापदंड नहीं होता।
इस बदलाव ने मुझे पछतावे से बचा लिया है। मुनीर नियाज़ी ने शायद मेरे लिए ही लिखा था—"हमेशा देर कर देता हूँ मैं।" अब बहुत हद तक ऐसा नहीं है। मुझमें झिझक बहुत हुआ करती थी। बात ज़ुबान तक आती थी, लेकिन मैं उसे पी जाती थी। मैंने स्वयं महसूस किया है कि बात कह देने से मन हल्का ही होता है। आप जिनसे प्रेम करते हैं, उन्हें यह जानने का अधिकार है कि आप उनसे प्रेम करते हैं।
एकालाप फ़िल्मों में अच्छा लगता है; वास्तविक जीवन में यह आपको वहाँ ले जाता है, जहाँ रास्ते ख़त्म हो जाते हैं। आप दूसरे के हिस्से के विचारों से अपने विचारों को दबा देते हैं। और हम जब ज़्यादा सोचते हैं, तो अक्सर उल्टा ही सोचते हैं। कह देने से आप स्वयं को रिहा ही कर रहे होते हैं।
मैं इस घिसी-पिटी धारणा के एकदम ख़िलाफ़ हूँ कि आपकी भाव-भंगिमा से यह प्रकट हो जाता है कि आप प्रेम करते हैं। और जिनके चेहरे शून्य होते हैं, क्या वे प्रेम नहीं कर सकते? कोई अंतर्यामी नहीं होता। यह एक पहलू हो सकता है, पर कह देने में क्या बुराई है? हमने मौखिक विकास भी तो किया है। वाक्यों को बचाकर हम क्या करेंगे?
जब आप किसी से कहते हैं कि आप उससे प्रेम करते हैं, तो अनकहे रूप में यह भी कहते हैं कि "मैं यहाँ हूँ।" किसी के केवल इतना कह देने से कि "मैं यहाँ हूँ", मनुष्य को एक अदृश्य सहारे का एहसास होता है। जीवन अकेलेपन में रंगा हुआ है, लेकिन एक भ्रम के सहारे उसमें थोड़ी-सी एकांत की जगह बन जाती है।
हम सब कहीं न कहीं प्रेम के अभाव में हैं। हम मान बैठे हैं कि प्रेम हमारे लिए नहीं है। पर सच तो यह है कि अगर हम अपने इर्द-गिर्द देखें, तो कोई न कोई हमें यह कह रहा होता है कि उसे हमसे प्रेम है, और शायद कुछ लोग अपनी झिझक के कारण उसे व्यक्त नहीं कर पा रहे होते। जो झिझक रहे हैं, उनकी आसानी के लिए आप एक कदम बढ़ा लें, वरना कभी-कभी देर हो जाती है। फिर इसी पछतावे के चलते आप वक़्त के पाबंद हो जाते हैं। लेकिन एक बार देर हो जाए, तो वहाँ पहुँचने का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
~आमना

प्रेम को व्यक्त कर पाना सरल के साथ साथ कठिन भी हैं, हम इसलिए भी नहीं कह पाते कि कही अगर प्रेम अस्वीकार कर दिया गया तों मैंने जो सपने देखे थे उनका क्या होगा हम मनुष्य सपनों और भविष्य कि कल्पनाओ में ज्यादा खोये रहते हैं, इसलिए हम में से ज्यादा लोग प्रेम को भीतर ही रखा लेते हैं!!
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