Skip to main content

"Dear...You came to mind"



Yesterday, I was thinking about something, and all of a sudden, you came to mind. It was a moment to cherish, but instead, it reflected nothing. We have come a long way; once, you were always in my thoughts, and now... Isn't it strange to perceive? At least, it is for me. I never thought your presence in my thoughts would ever perish. You would become a visitor. You were home to me. I sometimes wonder why someone would visit a homeless person. When one passes through that strange time period, every action seems strange. There is no explanation that could justify it except for time itself. In the end, every supposition proved correct; we ended up becoming strangers who can only visit the remnants of homes.   

~A

Comments

Popular posts from this blog

"पिता और काश"

  पिता से संवाद गिनती के रहे। डर का दायरा लम्बा-चौड़ा रहा। सवालों से पिता को ख़ूब परेशान किया। जब सवाल का जवाब ख़ुद ढूँढना शुरू किया तो पिता की रोक-टोक बीच में आने लगी। पिता भयानक लगने शुरू हो गए। पिता खटकने लगे।  पिता ने उँगली पकड़ कर चलना सिखाया और लड़खड़ाने पर थाम लिया। घर से बाहर की दुनिया की पहली झलक भी पिता ने दिखाई। मेले का सबसे बड़ा झूला भी झुलाया; खेत घुमाया, शहर घुमाया, रेल की यात्रा कराई। फिर दुनिया के कुएं में अकेले धकेल दिया। पिता उस गांव जैसे थे जहाँ से एक सपनों की पगडंडी शहर की सड़क से जा मिलती थी। मुझे भी वह पगडंडी भा गयी। अच्छे जीवन की महत्वाकांक्षा ने पहुँचा दिया, शहर। पिता से दूर, पिता के ऊल-जलूल उसूलों से दूर।  शहर की दुनिया, गांव में बसी पिता की दुनिया को दर-किनार करने लगी। समय बीता, और इतना बीत गया कि पिता पुराने जैसे नहीं रहे।  एक लम्बे-चौड़े व्यक्ति का शरीर ढल गया। चाल में लड़खड़ाना जुड़ गया। आवाज़ धीमी हो गयी। दुनिया के सारे कोने की समझ रखने वाला व्यक्ति, अब एक कोने में सिमट गया। पिता इन दिनों बच्चे जैसे हो गए। अपने कामों के लिए दूस...

"दिल और दिल्ली"

दिल्ली से लौटने पर कितनी ही बार  पाँवों  को इस दृढ़ता के साथ झटका कि अब कहीं जाकर दिल्ली की गति  पाँवों   से निकलकर धूल में ओझल हो जाएगी। लेकिन दिल्ली की गति न तो  पाँवों  का दामन छोड़ रही है, न ही विचारों की उथल-पुथल को बख़्श रही है। महज़ बीस दिनों का ही रिश्ता रहा दिल्ली से, लेकिन यह मुट्ठी भर दिन घर पर बिताए गए दो वर्षों पर भारी पड़ रहे हैं। बड़े शहरों की एक अपनी पकड़ होती है। आप जितनी दूर जाते हैं, उस शहर की पकड़ का अंदाज़ा उतना ही अधिक होता है। बड़ा शहर आपकी चाल-ढाल को तब ही पनपने देता है, जब उसके कंक्रीट के जंगल की हवा और आपके सपनों की साँस लेने की इच्छा के बीच कोई समन्वय बनता है। इन शहरों की अपनी एक गति होती है, और पाँव अनायास ही उस गति में रंग जाते हैं। "समय कितना हो रहा है?" — यह जानने के लिए आपको अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखने की आवश्यकता नहीं होती। किसी भी चेहरे को देखकर समय का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मेट्रो में चढ़ते-उतरते हुए, छोटी जगहों की ख़ुशबू का भी आना-जाना लगा रहता है। किसी स्टेशन पर कोई सपना चढ़ता है और किसी पर दिनभर की थकान उतरती...

"पिता: नायक या खलनायक?"

  आँखों ने पिता के चेहरे से ज़्यादा उनके पांव की तस्वीर क़ैद की है।  कत्थई रंग की एक जोड़ी चप्पल, जिसकी उम्र पिता की उम्र के बराबर ही रही होगी, उसे सीढ़ी पर रखे हुए देखने में पिता के पांव की छाप साफ़ नज़र आती है। पिता झुक कर चलने लगे हैं, लेकिन सारी उम्र रीढ़ का महत्व बताते आए हैं। सीधे नहीं बैठने पर टोकते हैं और सीधे रास्ते पर चलने के लिए दाएं-बाएं चलते हुए बताते हैं। पहले फटकार देते थे। फिर भी हम ऊट-पटांग काम करने से पीछे नहीं हटते थे। पिता का रोकना-टोकना, जीवन जीने के आड़े आता रहा। हम भाई-बहनों ने अपने जीवन की फ़िल्म का खलनायक, पिता को अपनी छोटी-सी बैठकी में सार्वजनिक तरीके से घोषित कर दिया। हम सब ने संकल्प लिया कि करेंगे तो अपने मन का। पिता का ज़माना गुज़र गया, यह नया ज़माना है — हम जैसों का, जो हमारे सामने खड़ा है। पिता का अनुशासन तब तक ही है जब तक हम सब घर में हैं। घर से निकलते ही, हम पतंग बन जाएंगे। घर छूटा, पढ़ने निकले — पतंग तो क्या, कटी पतंग बन गए। फिर समझ आया, पतंग को आसमान में उड़ते रहने के लिए अनुभवी हाथों में उसकी डोर होनी चाहिए। जिस पिता को हम खलनायक मान बैठे थे...