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"उदासियों का मौसम"


 

जैसे-जैसे जाड़े नज़दीक आने लगते हैं, वैसे-वैसे कुछ उदासियाँ गहरी नींद से उठकर हमारे बग़ल में आकर चुपचाप बैठने लगती हैं। उनका उद्देश्य हमें और उदास करना बिल्कुल भी नहीं होता। वे तो बस किसी बीते दौर में अपने होने का एहसास दिलाने आती हैं, और याद दिलाती हैं कि उदासियों से कहीं बड़ा है जीवन, और उनसे भी बड़े हैं हम।

वे ठंडी हवा की साँय-साँय में गर्मजोशी से हमारे साथ होती हैं — हमारी दूर तक पसरी हुई चुप्पी में हमें पुचकारती हुई। हमारे अतीत का चिट्ठा खोलकर यूँ बैठती हैं, मानो कोई यायावर बरसों बाद अपने घर लौटकर अपने कमरे का दरवाज़ा खोल रहा हो।

हमारे बिलखने से पहले ही वे हमें धकेल देती हैं उन जगहों पर, जहाँ लगभग तय था कि हम जूझ नहीं पाएँगे — लेकिन हम जूझे, और क्या ख़ूब जूझे।

अपनी चुप्पी तब अखरने लगती है, जब हाल-फिलहाल की उदासियाँ हमें अपना केंद्र मानकर, हमारी ही चुप्पी के साथ हमारे चारों ओर मंडराने लगें। ऐसा लगता है जैसे उन्हें पास खींचकर अपने साथ बिठा लिया जाए और दुनिया-जहान की बातें की जाएँ — ताकि हम दोनों एक-दूसरे की चुप्पी के शांत लेकिन गहरे वारों से बच सकें।

हर उदासी, अपने उद्गम से लेकर अंत तक, अपने आप में एक नाटक रचती है। हर बार, पूरी तन्मयता से, उदासियाँ वही नाटक दोहराती हैं — लेकिन हम ही ऊब चुके होते हैं। हमारा मन कुछ नया देखने को करता है, फिर भी हम बार-बार उन्हीं नाटकों की ओर लौटते हैं, और लगभग हर बार उनमें कुछ नया दिख ही जाता है।  

(भोगते हुए यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है कि कितना भोगा गया है — लेकिन दर्शक बनकर अपने भोगे की खिल्ली उड़ाना आसान लगता है।)

अभी तो जाड़ों की शुरुआत भर है, अभी तो उदासियों के साथ अलाव के इर्द-गिर्द बैठना, हँसना, और कोई गीत गुनगुनाना बाक़ी है लेकिन फ़िलहाल रफ़ी साहब और आशा जी की आवाज़ में....


अभी ना जाओ छोड़कर
के दिल अभी भरा नहीं
अभी ना जाओ छोड़कर...

अभी-अभी तो आई हो, अभी-अभी तो
अभी-अभी तो आई हो, बहार बन के छाई हो
हवा ज़रा महक तो ले, नज़र ज़रा बहक तो ले
ये शाम ढल तो ले ज़रा, ये दिल सम्भल तो ले ज़रा
मैं थोड़ी देर जी तो लूँ, नशे के घूँट पी तो लूँ
अभी तो कुछ कहा नहीं, अभी तो कुछ सुना नहीं
अभी ना जाओ छोड़कर...

सितारे झिलमिला उठे, चराग़ जगमगा उठे
बस अब न मुझको टोकना, न बढ़ के राह रोकना
अगर मैं रुक गई अभी, तो जा न पाऊँगी कभी
यही कहोगे तुम सदा, के दिल अभी नहीं भरा
जो खत्म हो किसी जगह, ये ऐसा सिलसिला नहीं
अभी नहीं, अभी नहीं, नहीं नहीं नहीं नहीं
अभी ना जाओ छोड़कर...


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