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"विनय, विस्मय और विनोद कुमार शुक्ल"

 

विनोद जी चले गए। आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि किसी बुज़ुर्ग और बीमार व्यक्ति के जाने पर आश्चर्य नहीं होता। हमें अंदाज़ा हो ही जाता है कि किसी भी घड़ी मृत्यु दरवाज़े के भीतर दाख़िल हो सकती है, लेकिन मृत्यु के इस घात के लिए कोई कभी तैयार नहीं होता। हम किसी के जाने को एक हद तक स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन उनके बिना जीवन गुज़ारने को मरते दम तक स्वीकार नहीं कर पाते। जिस तरह हमारे-आपके बाबा गए होंगे, लगभग उसी तरह विकुशु भी चले गए। हम रह गए, और रह गई दीवार में एक खिड़की— जस की तस, और उसके बग़ल में कील पर टंगी एक कमीज़।

किसी प्रिय के जाने पर कितने लोगों का जाना याद आता है। कितने सारे स्पर्श काया की सतह पर रेंगने लगते हैं। स्मृतियाँ हमारी याददाश्त की सीढ़ियों पर लुढ़कने लगती हैं। उनकी ख़ाली जगहों पर धुँधलके से वही उठते-बैठते नज़र आते हैं। जैसे विकुशु के शब्दों में कहा जाए कि, "हाथी आगे-आगे निकलता था और पीछे हाथी की ख़ाली जगह छूटती जाती थी।"

विनोद जी से कभी मिलना नहीं हुआ, हाँ, लेकिन मिलने की इच्छा ज़रूर रही। उन्हें सामने से सुनना था। उनके किसी आम दिन के चंद घंटों को जीवन भर के ख़ास पलों में समेटना था। ख़ैर! अब इस इच्छा का अधूरी इच्छाओं की श्रेणी में फलना-फूलना लिखा है। वे गए तो लगा कि सरल भाषा में पिरोया गया जादू चला गया, बाबा फिर चले गए। बड़े-बुज़ुर्ग जाते हैं तो अपने साथ भरी दुपहरी और बरगद की छाया लेकर जाते हैं। बेंत की कुर्सी का सिंहासन हमेशा के लिए ख़ाली रह जाता है। गमलों में पानी नहीं, उदासियाँ रिसती हैं। अख़बार पढ़े नहीं, पलटते जाते हैं।

अचल मिश्रा ने "चार फूल हैं और दुनिया है" में केवल विकुशु की दुनिया को कैमरे में क़ैद नहीं किया, बल्कि हमारे नाना-नानी, दादा-दादी, या फिर कह लीजिए कि बचपन को सहेज दिया।

विकुशु का अब कोई नया कविता-पाठ नहीं आएगा, लेकिन इतना ज़रूर है कि उनके पुराने कविता-पाठ को सुनते, देखते हुए यह अवश्य लगेगा कि वे रायपुर के अपने घर में झूला झूल रहे होंगे। उनका लिखा जीवन को सोने की चिड़िया नहीं बताता, लेकिन गौरैया के समान फुदकना सिखाता है। आम से आम घटना में भी जीवन बेहद ख़ूबसूरत है के दृश्य आँखों के सामने बुनता है। 

जब केदारनाथ सिंह लिखते हैं, "कि जाना हिंदी की सबसे ख़ौफ़नाक क्रिया है" तो हमें याद आता है कि इस ख़ौफ़ के साथ हम बरसों से जी रहे हैं। विनोद जी को गए कई दिन हो गए, लेकिन हर बीतते दिन के साथ लग रहा है कि वे कहीं नहीं गए, क्योंकि "कुछ भी नहीं में सब कुछ होना बचा रहेगा।"

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