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"इंतज़ार की पगडंडी"


बीते साल नए सालों के इंतज़ार में ही गुज़र गए। अब नए साल में, नए साल को लेकर तनिक भी उत्साह नहीं रहा। ऐसा लगता है जैसे मैं अचानक बहुत प्राचीन हो गई हूँ। अपने होने के प्रमाण ढूँढने के लिए मुझे बार-बार स्वयं को खंगालना पड़ता है। कुछ ढूँढते हुए एक काग़ज़ का टुकड़ा हाथ लगा, जिस पर कभी लिखा था, “इंतज़ार, ज़िन्दगी की सबसे झूठी कल्पना और सबसे सच्चा यथार्थ है।”

(कभी-कभी ज़िन्दगी के पारदर्शी सच किसी बड़े खुलासे की तरह सामने आ जाते हैं। तब उनसे टकराने से बेहतर, उन्हें गले लगा लेना होता है।)

हर व्यक्ति किसी न किसी इंतज़ार की डोरी से बँधा हुआ है। कोई किसी पुकार के इंतज़ार में है, कोई किसी आहट के, किसी दस्तक के, किसी मुक़ाम के, या फिर ऐसे किसी एक दिन के, जिसका उसे साफ़-साफ़ इल्म नहीं। उस दिन के आने से पहले तक हर दिन हैरान-परेशान गुज़रता है, और साथ ही एक इंतिहाई ख़ौफ़ज़दा ख़याल भी उम्र के साथ बूढ़ा होता जाता है कि अगर सारी ज़िंदगी हम इंतज़ार की पगडंडी पर ही भटकते रहे और उस एक दिन की सड़क तक पहुँचने से पहले ही रुख़्सत हो गए, तो…? क्योंकि वक़्त का दस्तूर है कि वह बेवफ़ाई ख़ूब करता है।

काश! सबको अपनी झोली में आए हुए इंतज़ार की मिक़्दार का अंदाज़ा होता। इंतज़ार में लीन व्यक्तियों की शक्लें हूबहू एक-सी होती हैं। नपे-तुले वाक्य, हँसी, आँसू और शेष सब कुछ किसी और दिन के इंतज़ार में बचा लिया जाता है।

नींद ने चलना तो शुरू कर दिया है, लेकिन अभी आँखों तक पहुँचने के लिए उसे कई सालों का सफ़र तय करना बाक़ी है। कहीं दूर से रौशनी खिड़की के रास्ते भीतर दाख़िल हो रही है। अँधेरे को दुत्कारने के लिए वह बार-बार जल-बुझ रही है। मेरी याददाश्त इंतज़ार के समंदर में गोते लगा रही है और मेरा शरीर बिस्तर पर पड़ा हुआ सारा तमाशा देख रहा है। तमाशे की सबसे अच्छी बात यह है कि उसके ख़त्म होने का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। नींद का क्या… आते-आते, आ ही जाती है।

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