आमतौर पर आम दिनों में भी ख़ास से ख़ास घटनाएँ आम ही लगती हैं। लेकिन कुछ एक-आध दिन ऐसे आते हैं, जब कोई आम-सी घटना भी ख़ास घटना की शक्ल ले लेती है। बीते दिनों एक बहुत पुराने दोस्त से बात हुई। उसने पुराने, दफ़न किस्सों को इस तरह उछाला कि कुछ देर तक तो मुझे लगा, जैसे मैं उन्हें पहली बार सुन रही हूँ।
देखिए, ये बात दर्ज करते हुए मुझे मेरी पसंदीदा फ़िल्म (The Lunchbox) का एक संवाद याद आ गया, “I think we forget things if there is nobody to tell them.”
मुझे लगता है, हमारे बारे में हमें दूसरों से पता लगता रहना चाहिए; वरना हम अपने आप को यादों के कब्रिस्तान में सबसे पहले और सबसे गहराई में दफ़न कर देते हैं।
आख़िर में उसने किस्सों को किनारे रखते हुए शिकायतों की डोर थाम ली। एक ख़ास शिकायत—जिसमें न नाराज़गी थी, न फटकार; हालाँकि चिंता साफ़ झलक रही थी।
“तुम्हें क्या हो गया है? एक दौर था, जब तुम्हारे पास बातों का पिटारा हुआ करता था। अब जितना पूछो, उतना ही नपा-तुला जवाब। न कभी ख़ैर-ख़बर देती हो। तुम चुप लोगों को अजूबा कहती थी। तुम्हें अपनी चुप्पी अखरती थी, अब वही चुप्पी भाने लगी है। लगता है, जैसे किसी अजनबी से ज़बरदस्ती बात कर रहा हूँ।”
उसकी इस ख़ास शिकायत का मेरे पास सिर्फ़ एक जवाब था, “नहीं, ऐसा नहीं है।”
(यह जवाब हमें बहुत कुछ बताने से बचा लेता है।)
उसकी बातों ने मुझे मेरा वह रूप याद दिला दिया, जो मैं किसी दौर में थी। थोड़ा अजीब लगता है कि एक ही ज़िंदगी में हम कितनी ज़िंदगियाँ जी लेते हैं। कोई हमें किसी एक तरह से जानता है, और हम अपने आप को जानने की जद्दोजहद में कई ज़िंदगियाँ जी जाते हैं। वक़्त और सहूलियत के हिसाब से हम बदलते रहते हैं। नए रूप में ढलते हुए हम धीरे-धीरे अपने पुराने रूप को दफ़नाते जाते हैं। कितना ज़रूरी है बदलना, और कितना ज़रूरी है बदले हुए को याद रखना। शायद उम्र की सीढ़ी चढ़ने पर चुप्पी से नज़दीकी बढ़ने लगती है। शायद इसीलिए भूलने की प्रवृत्ति हमें कई अवसादों से बचा लेती है।

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