हर यात्रा के बाद घर लौटकर, घर के हर हिस्से में घूमते हुए, जीवन में घर का होना और भी पुख्ता हो जाता है। घर में दाखिल होने से पहले ही कई आँखें चौखट से बहुत दूर तक इंतज़ार करती हुई नसीब होती हैं। ख़ुश-नसीबी का इल्हाम अक्सर जर्जर होने पर होता है। मैंने घर को हमेशा मुझसे गर्मजोशी से मिलते हुए पाया है।
कुछ दिनों बाद यात्रा से लौटी हूँ। घर नया-सा मालूम पड़ा, कुछ अजीबोगरीब। मैं अक्सर सोचती हूँ, जिनके घर नहीं बचते, वे कहाँ लौटने की इच्छा पालते होंगे। कितनी विडम्बना है कि यह विचार मुझे घर में बैठे हुए आ रहा है। घर की स्मृति धीरे-धीरे घर कर रही है। वक़्त तेज़ी से हाथों से फिसल रहा है और उम्र उस पड़ाव की ओर बढ़ रही है, जहाँ घर को मकान की दीवारों में कुरेद-कुरेद कर खोजा जाएगा। मकान सर पटकने के लिए होता है, और घर लहूलुहान हुए सिर का दवा-मलहम करने के लिए।
एक कोना पकड़कर अपनी यात्रा का हासिल खोजते हुए, पूरी यात्रा को दिमाग में दोहरा रही हूँ। मुझे अक्सर लगता है कि मैं वर्तमान को भविष्य में जाकर जीती हूँ। बहुत घातक है — बाद में जीना, देर से जीना, नापकर जीना, सोच-समझकर जीना।
यात्रा से पहले, यात्रा में क्या-क्या करना है, इसकी एक लंबी फ़ेहरिस्त बनती है। मेरे मामले में यह फ़ेहरिस्त यात्रा के पहले ही दिन फट जाती है। फिर मैं यात्रा के बहाव में बहने लगती हूँ। कभी किनारा मिलता है, तो कभी किसी पत्थर से टकराव होता है।
इस बार की यात्रा आकस्मिक रही। उन कुछ लोगों से मिलना हुआ, जिनसे मिलना लगभग असंभव था। बड़े दिनों बाद खुलकर हँसना हुआ। आँसू यात्रा के अंत के लिए बचाकर रखे थे, लेकिन वे बीच यात्रा में ही झरने की तरह बह गए।
इस यात्रा में अपने बारे में बहुत कुछ जानने को मिला। उन घर जैसी जगहों की ओर लौटकर गई, जैसे कोई अप्रवासी वर्षों बाद लौटता है। नए चश्मे से पुरानी चीज़ों को खोजा। बहुत तलाशने पर केवल कुछ अवशेष मिले। जो नहीं मिला, उसके लिए सब्र कर लिया। इस एक यात्रा में मैंने कई यात्राएँ कीं। जितना स्पर्श की स्मृतियों में बटोर सकती थी, बटोरा; और जितना आँखों में क़ैद कर सकती थी, उतना क़ैद किया।
इस यात्रा का हासिल यह रहा कि मनमाफ़िक अंत की कल्पना कुछ देर तक जादू का भ्रम दे सकती है, लेकिन असली जादू तो स्वयं यात्रा में होता है।
~आमना

Comments
Post a Comment