Skip to main content

"युद्ध"

 


कितना एकांत होता है किसी परीक्षा की तैयारी करना| एक 4 by 4 के कमरे में किताबों का ढेर और चारों ओर बिखरे हुए सपने और कहीं बीच में जूझते हुए हम| दुनिया का कहीं बहुत पीछे हाथ छूट जाता है और बस कमरे तक सिमट जाती है दुनिया| तैयारी का शुरुवाती दौर दुनिया को बदलने का साहस रखता है और अंत तक आते-आते बस जो कुछ भी बदल पाता है तो सिर्फ़ हममें| पता नहीं कितनी बार धैर्य का पुल गिरने वाला होता है पर दृंढ़ निश्चय बचा लेता है| कितनी बार लगता है कि क्यों देना ख़ुद को इतना कष्ट तब याद आती है सोहनलाल द्विवेदी जी की कविता की पंक्तियाँ~


“कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती”


बहुत मुश्किल होता है अपने आप को बांधे रखना| हर दूसरे दिन कहीं भाग जाने का मन करता है और हर दिन अपना मन मार के कुर्सी पे बैठ कर पढ़ना चुनना होता है| हमारे इसी तरह का छोटे-छोटे चुनाव, हमें हमारे गंतव्य के ओर पहुँचा देते है| कन्धा नहीं होता न कोई साथ देता है| तानों और तनाव से भरा होता है यह युद्ध और हर हाल में हमें यह युद्ध लड़ना होता है स्वयं के लिए|


बड़े-बड़े युद्ध अक़्सर शांत 

कमरों में अकेले लड़े जाते है|

~अज्ञात 


एक पेपर आपका भविष्य तय नहीं करता अगर यह मान लिया जाये तो शायद हम रेस में भागना ही छोड़ दें| तैयारी जी-जान से करनी चाहिए मानो कोई युद्ध हो और युद्ध का समाप्त होना बताएगा कि तुम हारे या जीते| युद्ध आख़िरी सांस तक लड़ा जाता है जिससे योद्धा बहादुर कह लाये|


गहन सघन मनमोहन वन तक मुझको आज बुलाते हैं

किन्तु किये जो वादे मैंने याद मुझे आ जाते हैं

अभी कहाँ आराम बदा, यह नेह-निमंत्रण छलना है

अरे अभी सोने से पहले मुझको मीलों चलना है

अरे अभी सोने से पहले मुझको मीलों चलना है

–हरिवंश राय बच्चन


~आमना 

Comments

Popular posts from this blog

"पिता और काश"

  पिता से संवाद गिनती के रहे। डर का दायरा लम्बा-चौड़ा रहा। सवालों से पिता को ख़ूब परेशान किया। जब सवाल का जवाब ख़ुद ढूँढना शुरू किया तो पिता की रोक-टोक बीच में आने लगी। पिता भयानक लगने शुरू हो गए। पिता खटकने लगे।  पिता ने उँगली पकड़ कर चलना सिखाया और लड़खड़ाने पर थाम लिया। घर से बाहर की दुनिया की पहली झलक भी पिता ने दिखाई। मेले का सबसे बड़ा झूला भी झुलाया; खेत घुमाया, शहर घुमाया, रेल की यात्रा कराई। फिर दुनिया के कुएं में अकेले धकेल दिया। पिता उस गांव जैसे थे जहाँ से एक सपनों की पगडंडी शहर की सड़क से जा मिलती थी। मुझे भी वह पगडंडी भा गयी। अच्छे जीवन की महत्वाकांक्षा ने पहुँचा दिया, शहर। पिता से दूर, पिता के ऊल-जलूल उसूलों से दूर।  शहर की दुनिया, गांव में बसी पिता की दुनिया को दर-किनार करने लगी। समय बीता, और इतना बीत गया कि पिता पुराने जैसे नहीं रहे।  एक लम्बे-चौड़े व्यक्ति का शरीर ढल गया। चाल में लड़खड़ाना जुड़ गया। आवाज़ धीमी हो गयी। दुनिया के सारे कोने की समझ रखने वाला व्यक्ति, अब एक कोने में सिमट गया। पिता इन दिनों बच्चे जैसे हो गए। अपने कामों के लिए दूस...

"चुप्पियाँ"

अब मुझे चुप रहना अजीबो-ग़रीब लगने लगा है। सच कहूँ तो, यह अपनी अनुभव की गई भावनाओं के साथ धोखा करने जैसा है। हम अक्सर चुप रहने का यह कारण देकर खुद को सवालों की लंबी सुरंग में फँसने से बचा लेते हैं कि हमारे पास कहने के लिए शब्द नहीं हैं। लेकिन क्या सच में शब्दों का ब्रह्मांड इतना सीमित है? या फिर हम शब्दों की खोज में प्रयास करने से कतराते हैं? चुप्पी किसी सवाल का जवाब हो सकती है, लेकिन जब एक चुप्पी का जवाब दूसरी चुप्पी बनने लगे और फिर सैकड़ों चुप्पियाँ एक-दूसरे को धकेलती हुई हमारी ओर कुचलने के भाव से बढ़ें, तो क्या यह गहन शोध का विषय नहीं बन जाता? हम अनगिनत भाषाओं की हवा में साँस लेते हैं, लेकिन जब चुप्पी तोड़ने की बारी आती है, तो हम साँस रोक लेना अधिक उचित समझते हैं। दरअसल, हम चुप्पियों से भरे पुतले बन चुके हैं। हम स्पर्श करने में संकोच करते हैं, फिर भी जैसे-तैसे पहला क़दम बढ़ा लेते हैं, लेकिन जब बात चुप्पी के सिरों को खोलने की होती है, तो हम हज़ारों क़दम विपरीत दिशा में रखने में सहज होते हैं। शुरू में चुप्पियाँ आलाप के मानिंद लगती हैं, पर समय बीतने पर वो विलाप में परिवर्तित हो जाती...

"दिल और दिल्ली"

दिल्ली से लौटने पर कितनी ही बार  पाँवों  को इस दृढ़ता के साथ झटका कि अब कहीं जाकर दिल्ली की गति  पाँवों   से निकलकर धूल में ओझल हो जाएगी। लेकिन दिल्ली की गति न तो  पाँवों  का दामन छोड़ रही है, न ही विचारों की उथल-पुथल को बख़्श रही है। महज़ बीस दिनों का ही रिश्ता रहा दिल्ली से, लेकिन यह मुट्ठी भर दिन घर पर बिताए गए दो वर्षों पर भारी पड़ रहे हैं। बड़े शहरों की एक अपनी पकड़ होती है। आप जितनी दूर जाते हैं, उस शहर की पकड़ का अंदाज़ा उतना ही अधिक होता है। बड़ा शहर आपकी चाल-ढाल को तब ही पनपने देता है, जब उसके कंक्रीट के जंगल की हवा और आपके सपनों की साँस लेने की इच्छा के बीच कोई समन्वय बनता है। इन शहरों की अपनी एक गति होती है, और पाँव अनायास ही उस गति में रंग जाते हैं। "समय कितना हो रहा है?" — यह जानने के लिए आपको अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखने की आवश्यकता नहीं होती। किसी भी चेहरे को देखकर समय का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मेट्रो में चढ़ते-उतरते हुए, छोटी जगहों की ख़ुशबू का भी आना-जाना लगा रहता है। किसी स्टेशन पर कोई सपना चढ़ता है और किसी पर दिनभर की थकान उतरती...