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"फिसलन"


दिन फिर से फिसलने शुरू हो गए है। आँखें पुराना कैलेंडर तलाश कर रहीं हैं। सूरज की किरणें पुराने एहसासत को तारो-ताज़ा कर रहीं हैं| सारे काश हाशिये पर खड़े दिख रहें हैं। नया हमारे सामने है लेकिन हम पुराना खोज रहे हैं| लगातार बेतरतीब सा महसूस हो रहा है| कोई तरकीब नहीं सूझ रही कि अपने बदन पर चिपके पुराने ख़यालों को कैसे झाड़ा जाये? इस पल में कैसे पुराने ख़ुद से छुटकारा पाया जाये? नए साल में कैसे ख़ुद को नए रंग-ढंग में ढाया जाये? पुरानी चीज़ों पर तो अक्सर दीमक लग जाती है| नए दीपक से कैसे उजाला किया जाये?


माँ द्वारा सिखाई गयी प्रेम की परिभाषा के सहारे, मैंने कितना कुछ सरलता से जाना है| पिता ने वियोग से लड़ना नहीं सिखाया परन्तु वियोग में जीना बतलाया| माँ-पिता का पुराना होना, हर नए साल पर कितनी पुरानी यादों को टटोलता है| पिता का ऐनक पिता जितना पुराना है किन्तु उसमें कभी धूल नहीं जमी और न ही माँ की शाल से धागे निकले| पिता अब कम बाहर जाते हैं और माँ के जोड़ों में दर्द रहता है| दोनों घंटों चुपचाप धूप में बैठते हैं और अपने लगाए पौधों को निहारते हैं|


एक दिन अचानक सब कुछ पुराना नज़र आने लगता है| नया, पुराने की याददाश्त नहीं मिटा सकता और ना ही उसकी जगह ले सकता है| हम नए की तरफ़ हाथ इस उम्मीद से बढ़ाते है कि शायद उसमें पुराने का स्पर्श मिल जाये|

~आमना 

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