Skip to main content

"बस और बकैती"


आंधी, तूफ़ान और मूसलाधार बारिश से घिरा हुआ है पूर्वांचल। उमस के कारण चिड़चिड़ेपन में डूबा हुआ है पूर्वांचल। पूर्वांचल में अवश्य लोग ज़मीन पर चलते हैं, लेकिन उनकी बातें सातवें आसमान पर सैर-सपाटा करती हैं। सड़क पर गड्ढे, मुँह में गुटका और ज़बान पर क़िस्से। यहाँ हर पहला आदमी तीसरे आदमी को जानता है। “चार लोग क्या कहेंगे” कहने वाले वो चार लोग यहीं से आते हैं। चाय की टपरियों पर अपनी संसद चलती है। आने वाले चुनाव में किसका पलड़ा भारी है और पिछले चुनाव में फलाने कैसे हारे; इसका मूल्यांकन होता है।

देश किस दिशा में जाएगा, हथेली पर तंबाकू मसलते हुए भविष्यवाणी की जाती है। अंधविश्वास का पव्वा चढ़ाकर, अपने बिस्तर पर खर्राटे मारते हुए, कल पर कायापलट करने का काम छोड़ दिया जाता है। यहाँ हर आदमी कहानीकार है। इन कहानीकारों को अक्सर बसों में पाया जा सकता है।

ये बसें अपने आप में आठवाँ अजूबा हैं। ज़मीनी पायलट की अगर कोई श्रेणी होती, तो इनके ड्राइवर उसी में आते। ख़स्ता-हाल बसें, जो कभी भी दम तोड़ सकती हैं। उनके पुर्ज़े कभी भी खेतों में छितरा सकते हैं। मुझे अक्सर इन बसों में यात्रा करते हुए आठवीं कक्षा में पढ़ा एक व्यंग्य खूब याद आता है—‘बस की यात्रा’। परसाई जी ने शायद इन्हीं बसों में यात्रा करते हुए उसे लिखा होगा।

बस कंडक्टर—महा बकैत प्राणी! इनके और बस के बीच माँ और छोटे बेटे वाला रिश्ता होता है। हज़ार ख़ामियाँ हों, लेकिन ठहरा तो राजा बेटा।

पिछले दिनों ऐसी ही एक बस में यात्रा करने का मौका मिला। मेरा मूसीक़ी का इश्क़ परवान चढ़ ही रहा था कि मेरे भीतर पूर्वांचल की मिट्टी का कर्ण, कंडक्टर साहब की बातों पर केंद्रित हो गया। बस के टायर सड़क को पकड़े हुए थे और मेरे कान हो रही बातचीत में जकड़ गए।

बात कहाँ से शुरू हुई, वो ठीक-ठीक मालूम नहीं। हो सकता है कि देश की दशा से हुई हो, लेकिन अब जब मैं सुन रही थी, तो बस की दशा पर हो रही थी।

कंडक्टर साहब ने बताया कि ये बस अब बूढ़ी हो गई है, वरना इसको इसके जवानी के दौर में आप देखते तो जलवा काटती थी। उम्र का तकाज़ा हो चुका है। जर्जर हालत हो गई है। आए दिन बीमार पड़ती है, खूब खर्चा होता है दवाई-इलाज में। खैर! देर-सवेर लोगों को उनके गंतव्य तक पहुँचा ही देती है।

“अरे भैया! कंडक्टरी हम तब से कर रहे हैं, जब यहाँ कच्ची सड़क हुआ करती थी। छत्तीस या सैंतीस साल हो गए। हम बूढ़े हो गए और यहाँ का रास्ता जवान हो रहा है। इधर का मौसम बदलते हुए देखा है। बाहुबलियों का वर्चस्व देखा और उनके साम्राज्य के ध्वस्त होने के भी साक्षी रहें। 

जब बुद्धि बट रही थी तब हमार मोटर मालिक संसार की सारे बुद्धि ख़ुदाई ले लिहिन। इनका कौनो भी टोपी पहना सकता है और ये वही टोपी कौनो और को। नयी बस लाये है ऑटोमेटिक अब याहर कौनो ड्राइवर जानत ही नाये है चलाये का। का बताई भैय्या, कौन मिट्टी से बना है ? रोज़ी-रोटी का मामला है कुछ बोल भी नहीं सकते। हम ठहरे नौकर आदमी। वो हमार मालिक। 

Comments

  1. I really enjoyed it, keep writing and sharing your thoughts and stories that’s always been so inspiring and grounded. Much love, stay blessed. 🫶🏻 Tabassum

    ReplyDelete
  2. Wow, it’s so well written! The choice of words and the use of dialect immediately transported me onto the bus. Looking forward to more stories like this. ~Faiz

    ReplyDelete
  3. I thought i was in that bus. How beautifully u wrote 🤍

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

"पिता और काश"

  पिता से संवाद गिनती के रहे। डर का दायरा लम्बा-चौड़ा रहा। सवालों से पिता को ख़ूब परेशान किया। जब सवाल का जवाब ख़ुद ढूँढना शुरू किया तो पिता की रोक-टोक बीच में आने लगी। पिता भयानक लगने शुरू हो गए। पिता खटकने लगे।  पिता ने उँगली पकड़ कर चलना सिखाया और लड़खड़ाने पर थाम लिया। घर से बाहर की दुनिया की पहली झलक भी पिता ने दिखाई। मेले का सबसे बड़ा झूला भी झुलाया; खेत घुमाया, शहर घुमाया, रेल की यात्रा कराई। फिर दुनिया के कुएं में अकेले धकेल दिया। पिता उस गांव जैसे थे जहाँ से एक सपनों की पगडंडी शहर की सड़क से जा मिलती थी। मुझे भी वह पगडंडी भा गयी। अच्छे जीवन की महत्वाकांक्षा ने पहुँचा दिया, शहर। पिता से दूर, पिता के ऊल-जलूल उसूलों से दूर।  शहर की दुनिया, गांव में बसी पिता की दुनिया को दर-किनार करने लगी। समय बीता, और इतना बीत गया कि पिता पुराने जैसे नहीं रहे।  एक लम्बे-चौड़े व्यक्ति का शरीर ढल गया। चाल में लड़खड़ाना जुड़ गया। आवाज़ धीमी हो गयी। दुनिया के सारे कोने की समझ रखने वाला व्यक्ति, अब एक कोने में सिमट गया। पिता इन दिनों बच्चे जैसे हो गए। अपने कामों के लिए दूस...

"दिल और दिल्ली"

दिल्ली से लौटने पर कितनी ही बार  पाँवों  को इस दृढ़ता के साथ झटका कि अब कहीं जाकर दिल्ली की गति  पाँवों   से निकलकर धूल में ओझल हो जाएगी। लेकिन दिल्ली की गति न तो  पाँवों  का दामन छोड़ रही है, न ही विचारों की उथल-पुथल को बख़्श रही है। महज़ बीस दिनों का ही रिश्ता रहा दिल्ली से, लेकिन यह मुट्ठी भर दिन घर पर बिताए गए दो वर्षों पर भारी पड़ रहे हैं। बड़े शहरों की एक अपनी पकड़ होती है। आप जितनी दूर जाते हैं, उस शहर की पकड़ का अंदाज़ा उतना ही अधिक होता है। बड़ा शहर आपकी चाल-ढाल को तब ही पनपने देता है, जब उसके कंक्रीट के जंगल की हवा और आपके सपनों की साँस लेने की इच्छा के बीच कोई समन्वय बनता है। इन शहरों की अपनी एक गति होती है, और पाँव अनायास ही उस गति में रंग जाते हैं। "समय कितना हो रहा है?" — यह जानने के लिए आपको अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखने की आवश्यकता नहीं होती। किसी भी चेहरे को देखकर समय का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मेट्रो में चढ़ते-उतरते हुए, छोटी जगहों की ख़ुशबू का भी आना-जाना लगा रहता है। किसी स्टेशन पर कोई सपना चढ़ता है और किसी पर दिनभर की थकान उतरती...

"चुप्पियाँ"

अब मुझे चुप रहना अजीबो-ग़रीब लगने लगा है। सच कहूँ तो, यह अपनी अनुभव की गई भावनाओं के साथ धोखा करने जैसा है। हम अक्सर चुप रहने का यह कारण देकर खुद को सवालों की लंबी सुरंग में फँसने से बचा लेते हैं कि हमारे पास कहने के लिए शब्द नहीं हैं। लेकिन क्या सच में शब्दों का ब्रह्मांड इतना सीमित है? या फिर हम शब्दों की खोज में प्रयास करने से कतराते हैं? चुप्पी किसी सवाल का जवाब हो सकती है, लेकिन जब एक चुप्पी का जवाब दूसरी चुप्पी बनने लगे और फिर सैकड़ों चुप्पियाँ एक-दूसरे को धकेलती हुई हमारी ओर कुचलने के भाव से बढ़ें, तो क्या यह गहन शोध का विषय नहीं बन जाता? हम अनगिनत भाषाओं की हवा में साँस लेते हैं, लेकिन जब चुप्पी तोड़ने की बारी आती है, तो हम साँस रोक लेना अधिक उचित समझते हैं। दरअसल, हम चुप्पियों से भरे पुतले बन चुके हैं। हम स्पर्श करने में संकोच करते हैं, फिर भी जैसे-तैसे पहला क़दम बढ़ा लेते हैं, लेकिन जब बात चुप्पी के सिरों को खोलने की होती है, तो हम हज़ारों क़दम विपरीत दिशा में रखने में सहज होते हैं। शुरू में चुप्पियाँ आलाप के मानिंद लगती हैं, पर समय बीतने पर वो विलाप में परिवर्तित हो जाती...