मुझे लगता था कि ठंड मुझे मार डालेगी, लेकिन तब तक चेन्नई का रुख नहीं किया था। अब यह साबित हो गया है कि भीषण गर्मी ही मेरी मृत्यु का कारण बनेगी। गर्मी इस कदर है कि लगता है, जैसे कोई ज्वालामुखी को पाल-पोस रहा हो। पसीना ऐसे निकलता है, मानो काया में पसीने की कोई फैक्ट्री लगी हो।
रोटी का नामो-निशान नहीं है। चावल खाते-खाते ज़बान रोटी का स्वाद भूल चुकी है। चेन्नई को तो मुझे अब तक निकाल फेंकना चाहिए, लेकिन चेन्नई उदार है। मुझ मासूम को किसी तरह पाँच साल झेल ही लेगी।
उत्तर भारत से आने पर आपको एक नई दुनिया में दाख़िल होने का आभास होगा। मुझे तो हर दिन ऐसा लगता है, मानो किसी ने किसी सपने में धकेल दिया हो। समझ में कुछ नहीं आ रहा, लेकिन आँखें फटी की फटी रह जाती हैं। पाँव की चकरी को अब सड़क मिली है, तो उसके ऊबड़-खाबड़ होने की शिकायतें हो रही हैं। इस नाशुक्री को मैं बेवकूफ़ी ही कहूँगी।
बड़े शहरों से ख़ौफ़ आता था। फिर दिल्ली में रहना हुआ और दिल्ली में ही बसने का मन बन गया। लेकिन दिल्ली ने केवल मेहमान माना, जैसे अब मैं चेन्नई में ख़ुद को मेहमान मान रही हूँ।
सूर्योदय से पूर्व ही अखाड़े में धोबी-पछाड़ शुरू हो जाता है। बारिश होती है तो चेन्नई से सुहाना कुछ नहीं लगता, लेकिन बारिश के बाद का चिपचिपापन आपको पागल कर सकता है।
इन सबके अतिरिक्त चेन्नई में बहुत कुछ है। रंग है, राग है और यह बिना रोब वाला शहर है। ज़मीनी लोग हैं, उदार लोग हैं। समंदर जैसे लोगों के लिए समंदर भी बहतेरे हैं। सुबह का ऐलान गजरा बुनती हुई औरतों से होता है और शाम की शुरुआत गजरा ख़रीदते हुए आदमियों से। फ़िल्टर कॉफ़ी की उलट-पलट के बाद भी चेन्नई में एक ठहराव है| फ़िलहाल चेन्नई से इतनी ही जान-पहचान हुई है।
नवंबर आ गया है और उत्तर भारत की सर्दियाँ यादों के दरवाज़े पर दस्तक दे रही हैं।
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