बीते साल नए सालों के इंतज़ार में ही गुज़र गए। अब नए साल में, नए साल को लेकर तनिक भी उत्साह नहीं रहा। ऐसा लगता है जैसे मैं अचानक बहुत प्राचीन हो गई हूँ। अपने होने के प्रमाण ढूँढने के लिए मुझे बार-बार स्वयं को खंगालना पड़ता है। कुछ ढूँढते हुए एक काग़ज़ का टुकड़ा हाथ लगा, जिस पर कभी लिखा था, “इंतज़ार, ज़िन्दगी की सबसे झूठी कल्पना और सबसे सच्चा यथार्थ है।” (कभी-कभी ज़िन्दगी के पारदर्शी सच किसी बड़े खुलासे की तरह सामने आ जाते हैं। तब उनसे टकराने से बेहतर, उन्हें गले लगा लेना होता है।) हर व्यक्ति किसी न किसी इंतज़ार की डोरी से बँधा हुआ है। कोई किसी पुकार के इंतज़ार में है, कोई किसी आहट के, किसी दस्तक के, किसी मुक़ाम के, या फिर ऐसे किसी एक दिन के, जिसका उसे साफ़-साफ़ इल्म नहीं। उस दिन के आने से पहले तक हर दिन हैरान-परेशान गुज़रता है, और साथ ही एक इंतिहाई ख़ौफ़ज़दा ख़याल भी उम्र के साथ बूढ़ा होता जाता है कि अगर सारी ज़िंदगी हम इंतज़ार की पगडंडी पर ही भटकते रहे और उस एक दिन की सड़क तक पहुँचने से पहले ही रुख़्सत हो गए, तो…? क्योंकि वक़्त का दस्तूर है कि वह बेवफ़ाई ख़ूब करता है। काश! सबको अपनी झो...
विनोद जी चले गए। आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि किसी बुज़ुर्ग और बीमार व्यक्ति के जाने पर आश्चर्य नहीं होता। हमें अंदाज़ा हो ही जाता है कि किसी भी घड़ी मृत्यु दरवाज़े के भीतर दाख़िल हो सकती है, लेकिन मृत्यु के इस घात के लिए कोई कभी तैयार नहीं होता। हम किसी के जाने को एक हद तक स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन उनके बिना जीवन गुज़ारने को मरते दम तक स्वीकार नहीं कर पाते। जिस तरह हमारे-आपके बाबा गए होंगे, लगभग उसी तरह विकुशु भी चले गए। हम रह गए, और रह गई दीवार में एक खिड़की— जस की तस, और उसके बग़ल में कील पर टंगी एक कमीज़। किसी प्रिय के जाने पर कितने लोगों का जाना याद आता है। कितने सारे स्पर्श काया की सतह पर रेंगने लगते हैं। स्मृतियाँ हमारी याददाश्त की सीढ़ियों पर लुढ़कने लगती हैं। उनकी ख़ाली जगहों पर धुँधलके से वही उठते-बैठते नज़र आते हैं। जैसे विकुशु के शब्दों में कहा जाए कि, "हाथी आगे-आगे निकलता था और पीछे हाथी की ख़ाली जगह छूटती जाती थी।" विनोद जी से कभी मिलना नहीं हुआ, हाँ, लेकिन मिलने की इच्छा ज़रूर रही। उन्हें सामने से सुनना था। उनके किसी आम दिन के चंद घंटों को जीवन भर के ख़ास पलों ...