मैं लिखती हूँ, शायद आशा की खोज में। अंधकार मुझे बार-बार लिखने की ओर धकेलता है, लेकिन मेरे लेखन में मुझे निराशा ही तैरती हुई दिखाई देती है। मैं अपने हिस्से के सूर्योदय की प्रतीक्षा में दर-दर भटक रही हूँ। हँसना मुझे आता है, लेकिन खुश रहना नहीं। यह विडंबना है कि न तो खुश रहना आता है और न ही दुखी होना आता है। लिखना स्वयं को बचाए रखने का एकमात्र ज़रिया है। प्रतिदिन मैं लेखन की तलाश करती हूँ और एक-आध दिन टूटी-फूटी व्याकरण में कुछ आड़ा-तिरछा लिख पाती हूँ। पिता बीमार हैं। वे काफी समय से बीमार हैं, लेकिन अपनी सामान्य बीमारी से इतर अब कुछ अधिक बीमार हो गए हैं। पूरे घर में एक अजीब-सा भय फैला हुआ है। बीमारी अक्सर व्यक्ति से निकलकर पूरे घर में फैल जाती है। लोग ज़्यादा नहीं बोलते; वे सतर्क हो जाते हैं और एक-दूसरे का हाथ थाम लेते हैं। मेरे लेखन में अम्मा ने पहले प्रवेश किया; पिता बहुत देर से आए। पिता का जीवन में उतरना और उतरकर साथ चलना—यह एक आधुनिक घटना है। अम्मा के साथ बैठकर चहका भी जा सकता है और बहका भी। पिता के साथ बैठकर केवल संजीदा हुआ जा सकता है। दिन गुजरने की रफ़्तार बढ़ चुकी है। कोई-न-को...
लंबे समय से पिता को बीमारी ने घेर रखा है। उसने उन्हें सिकोड़कर एक कोने में पटक दिया है। वे उस कोने से ऊब चुके हैं, लेकिन वे अपनी आह किसी को नहीं सुनाते। शरीर के अलग-अलग हिस्सों में बीमारी ने अपनी कलाकारी कर रखी है| पिता पहले बहुत कम बोलते थे; हालाँकि जितना बोलते थे, उसमें दुनिया भर की उम्मीद झलकती थी। बीमारी ने पिता को पुनर्जन्म दिया है। पिता कोने से रेंगते हुए दूर हो रहे हैं। वे बीमारी से रिहा नहीं हो सकते, लेकिन बंदिशों में बँधे होने के बावजूद आज़ाद कैसे रहा जा सकता है, इस पर शोध कर रहे हैं। वे स्वस्थ दिनों में बने तल्ख़ रिश्तों के सामने आलाप लगा रहे हैं। वे बीमारी को मात देने से ज़्यादा अपने भीतर बैठे अजीबोगरीब व्यक्ति को धराशायी करने निकले हैं। पिता हर दिन नए नज़र आ रहे हैं — एक अजनबी की तरह, जिसमें कतई अजनबीयत नहीं होती। पिता के पास बचपन के क़िस्से हैं। उनके कभी बच्चे होने का प्रमाण वे आजकल स्वयं प्रस्तुत कर रहे हैं। पिता अजीब लग रहे हैं; जो रेखाचित्र दिमाग में उजागर हो रहा है, वह कुछ अटपटा लग रहा है। अपने पिता को याद करते हुए वे किसी नन्हे बच्चे जैसे मालूम पड़ते हैं। पिता चहक रहे हैं, ...