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"मौन से संवाद"

मुँह से निकलती ध्वनियाँ दीवारों से टकरा कर मेरे सामने आकर बैठ रही हैं। संवाद एकतरफ़ा हो रहा है। खिड़की से बाहर कोई दूसरी दुनिया है और खिड़की से अंदर दीवारों से घिरी कोई तीसरी दुनिया है। पहली दुनिया, आश्चर्य से भरी दुनिया, जो मैं ख़ुद हूँ। कंठ से आज़ाद होने से पहली ही, विचार लड़खड़ा रहें हैं। मैं दूसरी तरफ़ खड़े होकर इनको प्रोत्साहित कर रही हूँ। मैं तीनों दुनिया के बीच झूल रही हूँ। कोई एक दुनिया पूरी तरह से मुझे, अपना नहीं होने दे रही । गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम नहीं हो पा रहा हैं। मैं वह त्रिवेणी हूँ जिसमें कोई संगम नहीं है। वे सारे संवाद मुझे डरा देते हैं जिनमें मैं सच में उपस्थित होती हूँ। हर बार मैं मौन का सहारा लेकर बच निकलती हूँ लेकिन अब मौन मुझसे संवाद करना चाहता है; अब बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है। मेरे कृत्रिम होने का राज़ तीनों दुनिया में खुल चुका है। मेरी उलझी दुनिया, और उलझ चुकी है। आँखें संगम ढूंढ रही हैं और शब्दकोश में शब्दों का सूखा पड़ गया है।  तीन तरफ़ से मुझे तीनों दुनिया ने घेर लिया है और चौथी ओर से मौन ने। मैं चारों ओर से घिर चुकी हूँ। संवाद का सिलसि...

"विस्थापन की खरोंच"

विस्थापन ने हमारे चीथड़े उड़ा दिए। शहरों में हम उन्हीं चीथड़ों को बीन रहे हैं। विस्थापित लोगों का गला सूखने लगता हैं जब उनसे कोई उनकी पृष्ठभूमि के बारे में पूछता हैं। विस्थापन से पहले के कालखंड की स्मृतियाँ उन्हें जीवित रखती हैं शहरों में। यह यूँ कह लीजिये कि शहर के पास इतना समय भी नहीं कि एक व्यक्ति अवगत हो पाए अपने जीवित और मृत होने से।  विस्थापित लोगों के चाल-ढाल में विस्थापन दिखाई पड़ता है। एक व्यक्ति अपना पूरा जीवन विस्थापन का बोझ ढोते निकाल देता है। विस्थापन का घाव पीढ़ी-दर-पीढ़ी भरता है। ऐसा ही कुछ हुआ होगा 1947 के साल भी। बटवारे में मिला ज़मीन का टुकड़ा , लोगों को उनकी मिट्टी नहीं दे पाया होगा। ज़मीन की लड़ाई में, ज़मीन लहूलुहान होती है पर ज़मीर की लड़ाई में पूरी मानवता।  शहर में दौड़ता व्यक्ति दूसरे दौड़ते व्यक्ति से छुपकर निकलने की जद्दोजहद इसलिए भी करता है कि कहीं दूसरे व्यक्ति का विस्थापन उसके विस्थापन से, विस्थापन की प्रतिस्पर्धा में आगे न हो जाये। कितना दौड़ना पड़ता है बच निकलने के लिए। विस्थापन सार्वजनिक है लेकिन इसका शोक व्यक्तिगत है।  जब पह...

"मृत्यु का अमृत"

जीवंत जीवन जीने में हम भूल जाते हैं मृत्यु को। मृत्यु का जैसे कोई अस्तित्व ही न हो। हर क्षण मृत्यु का डर मंडराना चाहिए लेकिन हर क्षण सांस लेने के घमंड ने हमें अँधा कर दिया। भुला दिया सबसे प्रामाणिक सत्य को, मृत्यु को। क्या है जीवन, को ढूंढते हुए; जीवन में ही खो गए।  श्रीकांत वर्मा जी की कविता "मणिकर्णिका का डोम" याद आ रही हैं। मणिकर्णिका घाट की स्मृति बार-बार दस्तक दे रही है। जीवन और मृत्यु का उत्सव मनाने वाला "काशी" याद आ रहा है। "मसान" फिल्म के दीपक का "बनारस" भी याद आ रहा है। मृत्यु के साथ कितना कुछ याद आ रहा। जीवन का अमृत गिरगिट लग रहा है, रंग बदल कर जीवन का विष हो रहा है।बिस्तर पर पड़ा शरीर, दीवार के सहारे रिसती हुई मृत्यु को देख रहा है। मन, जीवन के रचे षडयंत्र पर ठहाके लगा रहा है। आसपास के लोग तरस खा रहे है। उनकी आँखों में मृत्यु के भय से उठती तरंगे अठखेलियाँ कर रही है।  जीवन के सारे काश अब रीढ़ की हड्डी में कंपन पैदा कर रहे हैं। निकट आती मृत्यु के प्रकोप से सारे दुःख अपने-अपने घरों में जा छुपे है। अपने लोग हाथ पकड़कर, सिसकियों के साथ मायाव...

"शापित गौरैया"

अम्मा रसोई की खिड़की से कहीं दूर दूसरी खिड़की पर आँखें टिकाए, निढाल काया में खड़ी हुई हैं। मेरी आँखें अक्सर उन्हें इस स्थिति में पकड़ती हैं। पूछने पर वही घिसा-पिटा जवाब मिलता है- "कहाँ, यहीं तो देख रही हूँ।" अम्मा को झूठ बोलना नहीं आता है, पर दुःख छुपाने में महारत हासिल है। अम्मा से मिला जीवन इन दिनों, अम्मा की रहस्यमय दुःखी दुनिया में घुसने के अवसर ढूँढ रहा है। क्या है वह और क्यों है, जो इतने सालों से अम्मा को शापित किए हुए है? अम्मा ऐसी तो नहीं थीं। वह चहकती, खिलखिलाती अम्मा हुआ करती थीं। दुःख आने पर दुःख पर हल्ला बोल देती थीं। वह कौन सा दुःख है जिसने अम्मा को पकड़ लिया है? हर गुज़रते साल के साथ वह दुःख उन्हें खोखला करता जा रहा है। अम्मा गौरैया होती जा रही हैं। मैं अपने जीवन से अम्मा को विलुप्त नहीं होने दे सकती। आज सोचा कि मौक़ा मिलते ही सीधे तीर चला दूँगी, और चला दिया तीर। पूछ बैठी- "क्या कोई दुःख है?" अम्मा- "दुःख और मुझे!" (मुस्कुरा दीं) मुझे बस उनकी फीकी मुस्कान ही नज़र आई। अम्मा एक खुली किताब हुआ करती थीं, तब मुझे पढ़ना-लिखना नहीं आता था। उस दुःख क...

"खिड़की से बहता अरण्य"

  पेचीदा सड़कों से होते हुए, ज़मीन से नीचे जाते ज़ीनों से होकर मैं एक बहुत पुराने पुस्तकालय में पहुंची| ईंट के रंग की दीवारें और छत से कई सारे लम्बे से पंखे जिन्होंने आपने आप को पूरी तरह से गुरुत्वाकर्षण को सौंप दिया हैं| किताबों की दशा देख के अनुमान लगाया जा सकता हैं कि इस आधुनिक काल से पहले जन्मा होगा यह पुस्तकालय| मेरे पांव धीमे-धीमे आगे की ओर जाने लगे और सैकड़ों किताबों को पीछे छोड़ते हुए मानो किसी अदृश्य चमक की तलाश में हों| कुछ देर बाद मैं पुस्तकालय के अंतिम भाग में पहुंच जाती हूँ| रोशनी टिमटिमा रही है| दूर से जो दो व्यक्ति आपस में बात करते हुए दिख रहे थे, अब धीमे-धीमे उनके धुंधले चेहरे साफ़ नज़र आ रहे हैं| मैं जहाँ खड़ी थी वही जमी खड़ी रही....... वे दोनों... कोई और नहीं......निर्मल वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल हैं|        कुछ देर बाद, मैंने अपने आप को सँभालते हुए चारों ओर देखने की पुर-ज़ोर कोशिश की लेकिन मेरी आँखें एकटक दोनों लेखकों को देखती रही और कान में केवल पन्ने पलटने की आवाज़ आती रही|  मैंने सालों पहले अपने आप को ज़मीन में धंसते हुए पाया तो दो कि...

"घर की यात्रा"

एक लम्बी यात्रा के दौरान अलग-अलग शहरों में अलग-अलग बिस्तर पर रात गुज़ारने के बाद, शरीर को घर के बिस्तर की याद अपने आप आने लगती है| खिड़की से ऊनी पहाड़ साफ़ नज़र आ रहा है| बिस्तर पर कल रात का थका शरीर अब ऊर्जा से भर चुका है| यात्रा में होते हुए, पुरानी यात्रायें मेरे कुर्ते का एक छोर ज़ोर-ज़ोर से खींच रही हैं| मैं न चाहते हुए भी वर्तमान की यात्रा से अतीत की यात्राओं की यात्रा करने लग जाती हूँ| कितना कुछ है जिस पर मैंने अपना नियंत्रण बीते सालों में खो दिया है| बीते सालों की घटनाओं की खाई में गिरने से मुझे इन यात्राओं ने ही बचाया| सूरज की किरणों ने सुबह होने का अहसास लगातार कराया लेकिन उम्मीद की किरण ने आँखें थोड़ी देर से खुलवायी तब तक तो मैंने ना-उम्मीदी में भटकना भी शुरू कर दिया था| बहुत पहले किसी यात्रा का नाम सुन कर जी मतलाने लगता था अब बार-बार यात्राओं का साथ ले कर जी ठीक करती हूँ| समय के साथ कितनी सारी चीज़ों को लेकर मेरा विचार बदला, मैं बदली लेकिन घर को लेकर मेरा जुड़ाव और गहरा हुआ| गहराई का अंदाज़ा मुझे तब हुआ जब घर नहीं बचा| दीवारों से रिसता हुआ ख़ालीपन रह गया, घर गुज़र गया| सामा...

"झुर्रियों से झाँकती कहानी"

सड़क पार करते हुए मेरा हाथ अपने आप ही अम्मा का हाथ थाम लेता था, मानो अम्मा के हाथ में अपना हाथ देते हुए डरावनी सड़क कम डरावनी लगने लगती। मेले जाते तो आँखें रंग-बिरंगी चीज़ों पर अटक जातीं, लेकिन सारा होश-ओ-हवास अम्मा का हाथ थामे रहने में रहता था, कि कहीं भीड़ में गुम न हो जाऊँ। (किसी के हाथ में अपना कोमल हाथ देते हुए लगता है कि दुनिया की कठोरता कुछ क्षणों के लिए निलंबित हो गई है।) मुझे नहीं मालूम कि हाथ थामने का इतिहास कितना पुराना है, पर मेरे जीवन में हाथ थामना बहुत पुराना है। अनगिनत दफ़ा मैंने अम्मा का हाथ थामा है। फिर बड़े होने के बाद, शायद हाथ की उँगलियों पर गिन सकती हूँ कि कितनी बार अम्मा का हाथ थामा है। (बड़े होने के साथ हमारे भीतर की झिझक भी बड़ी होने लगती है।) छोटे होते हुए, मैंने अम्मा के हाथ का स्पर्श लगातार महसूस किया। अब बड़े होने के बाद, उन स्पर्शों की स्मृति ही मेरे साथ है। मैंने हाथ थामते हुए अम्मा का हाथ कभी नहीं देखा, लेकिन अब अक्सर मैं दूर से अम्मा के हाथ का मुआइना करती हूँ। झुर्रियाँ और उभरी नसों से सने हुए, फटे हाथों के बावजूद अब भी वह लगातार काम करती हैं। वह इतनी बू...

"कीलों का अतीत उसपे टंगा वर्तमान"

  सूरज डूबने के साथ, थकान का चिन्ह लेकर, मकान की तरफ़ लौटते ही दीवार में जड़ी कील पर चाभी के साथ, दिनभर का थका मुखौटा टांगना उचित लगता है। मकान में बिना किसी मुखौटे के घूमना झूठा है क्यूंकि मकान की नींव ही मुखौटों के ईंटों से रखी गयी हैं| गाँव के घर की दीवारों पर कई कीलें जड़ी हुई थी| पिता किसी पर थैला टांगते तो किसी पर चाभी या कपड़े लेकिन अम्मा को केवल कैलेंडर टांगना अच्छा लगता था| तारीख़ का हिसाब मिलता रहता और महीने का हिसाब-किताब भी लिख लेती| हमें तो केवल लाल रंग से लिखी तारीख़ ख़ूब भाती थी| छुट्टियों का इंतज़ार बड़ी धूम-धाम से करते थे| शहर की ओर जब शरीर बढ़ाया और कंधे पर लदे सामान में सपने और आत्मा को ज़बरदस्ती लादा तब लगा कि घर छोड़ना वास्तविकता में मज़बूत लोगों की निशानी है| हालाँकि मैं तो कमज़ोर थी लेकिन जब घर छूटा, काया और आत्मा दोनों चट्टान की तरह मज़बूत हो गयी| (शहर के शुरुआती दौर में, शहर आपकी रीढ़ की हड्डी पर वार करता है| आपको इतना मज़बूत होना पड़ता है कि उसका वार आपको वार न लगकर, पीठ थपथपाना लगे| ऐसे वारों में टिक कर खड़े रह जाने के बाद शहर वास्तव में, पीठ थप...

"धुनों में पिरोयी कहानियां"

  कोने में बैठी हुई कुर्सी ख़ाली पड़ी है| मेरा कमरे में होना वह अपनी आँखों में क़ैद कर रही है| कमरे से निकलने के बाद, मेरे एकांत से वह क्या संवाद करती होगी; यह मैं सोच रही हूँ | हम दोनों अपनी जगह पर चुपचाप बैठे हुए, दौड़ते हुए विचारों के पीछे भागते हैं| वह मेरे जीवन के बारे में कहानियां गढ़ती है और मैं अपने जीवन की कहानियों को टटोलती हूँ| जब अपनी कहानियों को टटोलते हुए ऊबने लगती हूँ तो खिड़की से बाहर ताकना शुरू कर देती हूँ | बाहर आते-जाते लोगों के बारे में मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने लगती हूँ | हम दोनों के द्वारा गढ़ी गयी कहानियों की भनक कमरे को भी नहीं लगती है| अपनी-अपनी कहानियों का संरक्षण हम ख़ुद करते है, चुप रहकर, अनजान बने रहकर| हम एक दूसरे के जीवन में हस्तक्षेप करने में कतराते है| हमें लगता है कि अगर हमारी कहानियों ने चौखट लाँघी तो वे हमारा पर्दाफ़ाश कर देंगी| हमें पाश-पाश कर देंगी| हमें कहानियों का गट्ठर ढोने में कभी थकान नहीं हुई| हमें बचाये रखने में कहानियों का हाथ है लेकिन हर दिन हमें थोड़ा-थोड़ा तबाह भी कहानियां ही करती है|    एक कहानी से प्रस्थान करते हुए, दूस...

"बासी लेखन"

  आजकल एक नए से डर के घेरे में रहना शुरू हुआ है| कई डर आये और कुछ दिन गुज़ार कर चले गए| शायद यह भी चला जाये कुछ दिन बाद, पर जितने दिनों से यह साथ में है जीवन दूभर है| पहली बार किसी डर ने लेखन के आसपास भटकने की हिम्मत की है| मुझे डर लगने लगा है कि कहीं मेरे लेखन से बास न आने लगे| अभी तक मेरा लेखन निडर रहा है| हाँ, पर मैं डरी-सहमी ज़रूर रहीं हूँ|  मैंने अपने लेखन के इर्द-गिर्द ख़ुद को भी नहीं जाने दिया पर यह प्रेत नुमा डर मेरे लेखन के पास मंडरा रहा है| मुझे अँधेरे से डर लगता रहा लेकिन लिखते समय मुझे अँधेरा चाहिए होता है किन्तु अब लगता है कि मेरे पीछे कोई बैठा हुआ है जो निरंतर मेरी उँगलियों को कीपैड पर पड़ते देख रहा है| मैं निरंतर काँप रही हूँ कि वह मेरे ताज़े से लेखन को कहीं बासी न कर दे| मुझे हर बासी होती हुई चीज़ों से खीज महसूस होती है जैसे बिस्तर के किनारे पड़ी हुई किताबें, संदूक में पड़े एल्बम, मकानों में पड़ी घर की स्मृतियाँ, पड़ोसी के अमरूद के पेड़ से गिरे अमरूद, दालान में पड़ा अख़बारों का अम्बार, गमलों के पेंदे पर जमी काई और अब बासी होती हुई चीज़ों का और विस्तार...

"किवाड़ पर उभरे गड्ढे"

  जब छुट्टियों में घर जाना होता, तो अम्मा और किवाड़ दोनों इंतज़ार करते हुए मिलते थे। अम्मा की चमकती आँखें दिखतीं, पर नीचे आए गड्ढे हर बार और गहरे हो जाते। पिछले कितने बरसों से वह घर में रहकर भी कभी पिता की राह तकती थीं, तो कभी हमारी। अम्मा ने सुख में भी इंतज़ार किया। अम्मा की आख़िरी स्मृति किवाड़ के सहारे टिक कर खड़े हुए है। उनका आधा शरीर घर की ओर है और आधा शरीर बाहर, जैसे वह आधी जीवित और आधी मृत हों। अम्मा अब जा चुकीं हैं, बहुत दूर; लेकिन हमें केवल घर की दूरी मालूम रही। अम्मा की मौत पर घर भी क़ब्रिस्तान तक गया था, हालाँकि किवाड़ अपनी जगह जमा रहा और बिलखता रहा। कितना सब कुछ अम्मा अपने साथ ले गईं और जो छूट गया, वो अपने पैरों पर चल कर ख़ुद चला गया। साल रेंग रहे हैं, महीने चल रहे हैं और घड़ी की सुई दौड़ रही है। घर अब पास लगने लगा है, लेकिन वहाँ जाने की वजह, बहुत साल पहले; बहुत दूर चली गई। अम्मा का पता घर था, पर घर अम्मा से था। अम्मा के बाद हम घर पर बहुत लम्बा रुके, जहाँ रुके वह मकान हो चुका था। हमने सिंधु घाटी सभ्यता को खंडहर होते हुए नहीं देखा, केवल उसके बारे में सुना था, पर हमने घर ...

"शोषित पाँव"

  एक वक़्त बाद बहुत ज़रूरी हो जाता है लौटना| जहाँ से पाँव ने भागना शुरू किया था शायद वहाँ लौटना असंभव होता है इसीलिए उस तरफ़ लौटने का विचार भी नहीं आता| लेकिन कभी-कभी कहीं बस लौट जाने को मन उतावला हो जाता है, जहाँ पाँव पर आये छालों को देखा जा सके, उन्हें खुले में छोड़ा जा सके और हाँफते हुए शरीर को फिर से हाँफने के लिए तैयार किया जा सके| बचपन में घर के बड़ों ने माँ और पिता को बतला दिया था कि इसके पाँव किसी एक जगह नहीं टिकेंगे| वाक़ई, पाँव हवा में ही रहें| कभी पाँव किसी शहर में लगभग टिकने को होते तो दूसरे शहर से बुलावा आ जाता| पलायन से भरपूर जीवन दूर से देखने में सुन्दर लगता है हालाँकि पास से देखने में एकदम फीका होता है| एक शहर की सुगंध लिए दूसरे शहर भागती नाक, अपनी पसंदीदा गंध भूल जाती है|  किसी एक शहर को अपना शहर बोलने में ज़बान लड़खड़ाने लगती है| किसी एक शहर में इतना रहना नहीं हुआ कि उस शहर के आग़ोश में चैन से नींद आयी हो| मुझे हमेशा लगता रहा कि भागते रहना, हमें जीवन की मुश्किलों से निज़ात दिलाता है क्यूँकि भागते हुए इंसान का ध्यान सिर्फ़ भागने पर रहता है| (ख़ानाबदोश जीव...

"दौड़ता शहर"

  मैं पागलों की तरह सड़क के बीचों-बीच दौड़ रही हूँ जबकि दौड़ने से मेरा दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहा| (अक्सर हम वे सपनें देखते हुए ख़ुद को पाते हैं जिनका कोई सर-पैर नहीं होता|) सहसा मेरी नींद टूटी|   (शहर में नींद खुलती नहीं, टूटती है|) मेरा पूरा शरीर पसीने से तर-ब-तर पड़ा है| मैं बिना सोचे बालकनी की तरफ दौड़ी कि शायद बाहर की ठंडी हवा लगने से कुछ जान में जान आ सकें|  भीतर जो कुछ दौड़ रहा था वो अब बाहर भी दिखाई दे रहा है| दौड़ता, हांफता हुआ|  कृत्रिम रोशनियों ने सारे शहर को उजाले में छुपा दिया है| सड़कों पर चंद गाड़ियाँ अभी भी दौड़ रही हैं| शहर का एक छोर कहीं अनंत में लटका हुआ है और दूसरा छोर कहीं शून्य में पड़ा हुआ है| मैं शून्य से अनंत तक पलक झपकते दौड़ गयी मानो मेरी कोई पसंद की चीज़ शून्य से अनंत में जा के छुप गयी हो| शहर हमेशा से मेरे गले में फँसी हड्डी के समान रहा है| इस हड्डी की बनावट में सपने और ज़रूरतों के खनिजों का उपयोग हुआ है| मुझे शहर से कभी घृणा नहीं रहीं और न ही कभी प्रेम रहा| (जीवन में कभी कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जिसमें न घृणा होती है न प्रेम|) ज...

"अम्मा का बच्चा होना"

माँ को अपनी माँ के बारे में बात करते हुए मुझे माँ में उनकी माँ की बेटी दिखती थीं, चंचल, नादान बच्ची। शायद वह भूल जाती थीं अपना माँ होना। उन्हें दिखने लगता था झूला, जिसको झूलते समय उन्हें चोट लगती थी और वह दौड़ती हुई माँ के पास पहुँचते ही लिपट जाती थी। मैं अम्मा से लिपट कर उन्हें उनका माँ होना याद दिलाती थी। (बच्चे रहते हुए हम अपने माँ-बाप का कभी बच्चा होना सोच नहीं पाते हैं।) माँ का होना सुकून है। माँ के न होने पर पिता के भीतर की माँ बाहर आती है, जिसे पितृसत्ता के विचारों ने नहीं पाला-पोसा होता है। कोमलता और ममत्व से ओतप्रोत पिता, माँ हो सकते हैं, पर वह माँ की जगह हमेशा रिक्त छोड़ देते हैं, क्यूंकि यह पिता का पितृ भाव है। माँ परियों की कहानी सुनाते-सुनाते मुझे अपने साथ किसी अजीब-ओ-ग़रीब दुनिया में ले जाती थीं, जहाँ लोग ख़ुशहाल थे, जहाँ सब एक दूसरे को दुआ देते थे। शायद माँ ने यह दुनिया अपनी माँ के साथ भी घूमी होगी तभी हर चप्पा-चप्पा माँ जानती थीं। दूर से दुनिया की सारी माओं को देखने पर एक चीज़ सामान्य दिखती है कि समाज ने उन्हें अपने चंगुल में जकड़ रखा है। क़रीब से देखने पर उनके हाथ-पाँव...

"मृत घर और आवारा मकान"

जिस तरह से मृत्यु नहीं टाली जा सकती उस तरह से एक उम्र के बाद घर को छोड़ना नहीं टाला जा सकता है| और तब हमें केवल घर का पता याद रह जाता है| जीवन में हर तरह की यात्रा घर से प्रारम्भ होती है लेकिन दुर्भाग्य से किसी भी यात्रा का अंत घर पर नहीं होता है| जीवन गतिशील होता है और इसके विपरीत होता है ठहराव से भरपूर घर| घर उद्गम है जिसके पास लौटना असंभव है| (असंभव में एक तरह का शांत दिलासा है|) लम्बे समय तक घर मेरी चारों दिशाओं में रहा फिर समय बीत गया, अब किसी दिशा में मुझे घर नहीं मिलता| घर अब मकान में तब्दील हो चुका है फिर भी मैं कभी-कभार उस मकान में घर की गंध सूँघने जाती हूँ लेकिन चौखट लाँघते ही मुझे स्थिर मकान में दौड़ता घर दिखने लगता है| वह दौड़ता घर मुझे कुचल कर मकान की चौखट लाँघ कर कहीं खो जाता है| मैं घर को पकड़ने नहीं दौड़ती क्यूंकि अब दौड़ने का साहस मेरे भीतर नहीं बचा है|  आँगन में लगी तुलसी अब सूख चुकी है पर मेरी घर की खोज अभी भी वैसी ही है जैसे तुलसी के अवशेष की अपनी जगह| पिता की चारपाई के पाए अब कमज़ोर हो चुके है जैसे वह अपने आख़िरी दिनों में हो गए थे| माँ की अलमारी में दीमक लग चु...

"शहरी पिशाच"

  शहर में घुसते ही एक अलग सा दबाव महसूस होता है मानो अगर नहीं दौड़े तो मारे जायेंगे और मरना किसी को नहीं पसंद है| हालाँकि बहुत सारे लोग मरे हुए हैं पर वे जीवित होने का ढोंग करते-करते लगातार मर रहे हैं|  (हर दिन बड़े शहर में छोटी-छोटी मौतें ख़ैरात में मिलती है|) फिर क्यों मौत का तांडव देखना है? क्यों शहर जाना है? शहर एक चुम्बक के भांति है जो जीवनकाल में एक बार अपनी ओर इस तरह आकर्षित करता है| उसके चुम्बकीय क्षेत्र से बाहर निकलना असंभव है और मनुष्य को असंभव काम करने में उत्साह मिलता है| लोग शहर को उम्मीद की तरह देखते है और मैं शहर को क़ब्रिस्तान की तरह| कितना द्वन्द से भरा है न मेरा नज़रिया; पर क्या करूँ?- शहर का ख़ालीपन, मौत के बाद की शान्ति से भी गहरा है| मुझे हर गहरी चीज़ में अपनी परछाई नज़र आती है| मुझे शहर का रंग नहीं चढ़ा हालाँकि गांव का रंग उतर चुका है| शहर ने गांव को मौत के घाट उतार दिया है| मैं अपनी कंक्रीट क़ब्र से उठकर जानदार सपनों के पीछे भागती हूँ और मेरे जैसे सैकड़ों निर्जीव लोगों को उन कंक्रीट सड़कों पर भागते हुए पाती हूँ जहाँ मैं कभी पगडंडियां पार क...

'समय क्या है...?'

कभी कोई सवाल इतना व्याकुल कर देता है कि मन दौड़ लगाने को हो आता है पर दौड़ कर सवाल से दूर तो जाया जा सकता है पर ख़ुद से दूर भागना असंभव है| कैलेंडर की अगली तारीख़ में प्रवेश करने के साथ ही अपने आप के सामने तो आना ही पड़ता है| कितना दार्शनिक है न यह सवाल कि समय क्या है? सुबह उठ कर रोज़-मर्रा के काम में लग जाना और फिर रात को सोते हुए आने वाले कल के काम की फ़ेहरिस्त को दिमाग़ में दोहरते हुए, नींद की आग़ोश में सो जाना|  समय साथ ही निकलता होगा सुबह में पर मैं अपने कामों में इतनी उलझी होती हूँ कि उससे बात करके उसको समझने की कोशिश नहीं कर पाती| एक रोज़ समय की सुई समय से तेज़ भागी तो मैं पीछे छूट गयी| हड़बड़ाहट में मैं जब घर से निकलते ही दौड़ने लगी मानो अपनी जान बचाने के लिए दौड़ रही हूँ और इसी के चलते मैं अचानक समय से टकरा गयी लेकिन मैंने ख़ुदको संभाला और कलाई में बंधी घड़ी को देखा तो थोड़ी स्थिर हुई कि मैं तो समय से आगे निकल चुकी हूँ| एक बार फिर घड़ी की ओर देखा और मन की संतुष्टि के लिए पीछे मुड़ कर देखा तो समय कहीं नहीं दिख रहा था केवल धुंध दिखाई दे रही थी| बचपन से ही अपने आसपास के ...

'साया और काले साये'

सिर पर अतीत का भार दाब लगा रहा है और सिर के ठीक ऊपर काले बादल मंडरा रहें हैं| भीतर निरंतर गर्जन महसूस हो रही है| अनंत तक बरसात की आशंका है और आँसू का झरना भी तत्पर है| दूर तक देखने पर केवल काले साये नज़र आ रहे हैं और अपने आसपास घोर अँधेरा| अँधेरा परिचित मालूम पड़ रहा है वैसे यह परिचित अँधेरा, कई अपरिचित अँधेरों ने मिलकर जन्मा है|  यह शोरगुल करती दुनिया अपने साथ कितना गहरा सन्नाटा लेकर चलती है|  (मौत से भी गहरा सन्नाटा) आदमी अपने काम का शोर इतना बढ़ा देता है कि वह बच सके इस सन्नाटे से पर वह अपने भीतर के सन्नाटे से नहीं बच पाता| (आदमी लौटता है एक दिन दुनिया के शोर से अपने भीतर के सन्नाटे की ओर|) माँ का आँचल जब छूटा तो कई दिनों तक काल्पनिक आँचल में मैंने ख़ुद को छुपाये रखा|  (कल्पना की आयु बहुत छोटी होती है और वास्तविकता की आयु, इंसान के जीवनकाल के बराबर|) कल्पना ने जब धक्का मार के वास्तविकता की झोली में फेंका तब मैंने ख़ुद को कठपुतली के समान पाया| जो सुबह उठ के रोज़ी-रोटी के लिए भागती और शाम को ज़िम्मेदारियों का हिसाब-किताब देती| दुनिया को जीवित और मैं ख़ुदको मृत ...

"व्यस्तता का साथ"

जब किसी भाव या अतीत से हमें भागना होता हैं तब व्यस्तता का कवच पहनना सबसे आसान लगता है|  (भागना इंसान की पहली प्रवृत्ति है|) व्यस्तता का चुनाव करने में कितनी बार हताश होना पड़ता है लेकिन एक बार व्यस्तता का हाथ थाम लो तो हताश होने या हताशा के बारे में विचार करने का समय नहीं मिलता| हताशा का जन्म अपेक्षाओं के कारण होता है और इंसान की मृत्यु तक इंसान को हर तरह से ये सताती है| (इंसान बंद आँखों से ज़्यादा सपने देखता है और खुली आँखों से देखे गए सपनों को भगवान भरोसे छोड़कर बैठता है|) मैंने लोगों का हाथ थामा और कुछ समय के उपरान्त लोगों ने हाथ झटक कर दूर जाना तय किया, मैं वहीं उनकी पकड़ की स्मृति के साथ देखती रही उनका ओझल होना और आँख गड़ा कर बैठी रही, उनके वापस लौटने की उम्मीद में| (उम्मीद इंसान को धीमे-धीमे मारती है|) मैं कुछ सपनों के पीछे भागती रही मानो जीवन में केवल एक लक्ष्य हो, पीछा करना| सपनों में जीना चुना और सपनों को वास्तविकता में लाने की पूरी कोशिश की, पर सपनों ने कल्पना में रहना चुना| फिर जीवन में आगे बढ़ने का सोचा पर अतीत की मज़बूत पकड़ में जकड़ी रही|  रात को सोना और सुबह उठन...

"अकेलेपन से एकांत की ओर"

एक वक़्त बाद अकेलापन इतना अकेला महसूस होने लगता है मानो वहाँ हमारा होना भी एक भ्रम जैसा हो| ख़ुद से बात करने के लिए कुछ नहीं बचता| कुछ नया करने से पहले ही मन ऊब जाता है| अकेलापन चुभना शुरू कर देता है| हम खोजने लगते है एक ऐसी जगह जहाँ से सब कुछ इतना भरा हो कि हमें अकेलापन का पता ही न चले| अंततः हम व्यस्तता का हाथ थाम लेते है| (अकेलापन तब खलने लगता है जब हम अकेले होने का मूल्यांकन करना शुरू कर देते है|) फ़िलहाल मैं छत के एक कोने में बैठकर अपने आसपास की दुनिया को देख रहीं हूँ| कितनी अस्थिर है दुनिया| लगातार भाग रही है भीड़ से अकेलेपन की ओर और अकेलेपन से भीड़ की तरफ़| कुछ को कहीं-न-कहीं पहुँचने की जल्दी है और कुछ को कहीं लौटने में अभी देरी है| हालाँकि मुझे इस पल में ठहरे रहने का सुख, दूसरों के दुःखों को महसूस करके नहीं गवाना है|  आज पहाड़ काफ़ी साफ़ दिख रहे है| पंछी आसमान में लम्बी और ऊँची उड़ान भर रहे हैं| कितना सुख मिलता है प्रकृति के आश्चर्य से बार-बार आश्चर्यचकित होने में| एक ठंडी हवा का झोंका जैसे ही बदन छूता है वैसे ही एक सिहरन भीतर दौड़ लगाने लग जाती है| मैं भूल गयी थी कि अत...

"त्रासदी से संवाद"

जीवन के बीतते दिनों को किसी एक खाँचें में रखने में ख़ुदको को हमेशा असमर्थ पाती हूँ । अच्छे तरीके से न सुख जिया हैं न बुरे तरीके से दुःख से दो-दो हाथ कर पायी। दोष देने के लिए बहुत सी चीज़ें है जैसे समय, किस्मत, लोग हालाँकि सबसे बड़ी दोषी मैं ही रही हूँ। समय पर, बीते समय की बेड़ियों में जकड़ी और आने वाले समय की चिंता में एक कोने से दूसरे कोने भागती हुई । मैं समय की त्रासदी में अपनी हिस्सेदारी देती हुई, बीता रही हूँ जीवन, एक त्रासदी से दूसरी त्रासदी के बीच।  (त्रासदियों में सबसे बड़ी त्रासदी और सबसे छोटी त्रासदी का मूल्यांकन करना भी एक त्रासदी है।) प्रेम कच्ची उम्र में हुआ जिसने पक्के घाव दिए| यह शायद सबसे बड़ी त्रासदी होते-होते रह गयी हालाँकि प्रेम का न रहना एक त्रासदी है पर प्रेम तो अजर-अमर होता है| हो सकता है विरह को त्रासदी कहा गया होगा| वैसे मैंने प्रेम में रहते हुए भी विरह महसूस किया है और विरह में रहते हुए, प्रेम| तो हो सकता है जो चीज़ हमारे आसपास घट रही है और जो भी हमारे भीतर सब किसी न किसी त्रासदी की ओर दर्शाती है| (प्रेम नहीं होना एक त्रासदी है और प्रेम होना भी एक त्रास...

तुम लौट आओगे, शायद!

  रेलवे स्टेशन, बस अड्डा, एयरपोर्ट वग़ैरा रहा होगा चश्मदीद गवाह, बिछड़ने की घड़ी का, हालाँकि वास्तव में अलग होने से पहले, कई दिन तक दो लोगों ने लगातार महसूस किया होगा, बिछड़ना| विरह, वियोग, हिज्र की तीव्रता को अपने-अपने हिसाब से भोगा होगा जैसे मैं आजतक भोग रही हूँ|  तुम्हारा जाना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी पर मेरे जीवन की वह घटना थी जिसे मैंने कभी नहीं सोचा था| (कुछ घटनायें यथार्थ के एकदम क़रीब होती है पर हम उसे अपनी कल्पना में भी अपने आसपास नहीं भटकने देते है|) नियति ने तय किया होगा तुम्हारा जाना लेकिन मैं नियति में विश्वास नहीं रखती थी| मुझे लगता था चीज़ें हमारे अनुसार होती है हमारे भले के लिए| पर तुम्हारे जाने में मेरा क्या भला रहा होगा? आज तुम्हें गए हुए सालों हो चुकें हैं पर तुम्हारी जाने की स्मृति इतनी ताज़ी हैं कि लगता है कल ही इस स्मृति ने जन्म लिया था| (समय के साथ हम बूढ़े हो जाते है लेकिन कुछ स्मृतियाँ समय के साथ और जवान हो जाती है|) तुम्हारे जाने के अतीत ने मेरे वर्तमान का आज भी हाथ पकड़ रखा है जैसे हम दोनों ने उस दिन एक दूसरे का हाथ पकड़ा था, विदा लेने से ठीक पह...

"युद्ध"

  कितना एकांत होता है किसी परीक्षा की तैयारी करना| एक 4 by 4 के कमरे में किताबों का ढेर और चारों ओर बिखरे हुए सपने और कहीं बीच में जूझते हुए हम| दुनिया का कहीं बहुत पीछे हाथ छूट जाता है और बस कमरे तक सिमट जाती है दुनिया| तैयारी का शुरुवाती दौर दुनिया को बदलने का साहस रखता है और अंत तक आते-आते बस जो कुछ भी बदल पाता है तो सिर्फ़ हममें| पता नहीं कितनी बार धैर्य का पुल गिरने वाला होता है पर दृंढ़ निश्चय बचा लेता है| कितनी बार लगता है कि क्यों देना ख़ुद को इतना कष्ट तब याद आती है सोहनलाल द्विवेदी जी की कविता की पंक्तियाँ~ “कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती” बहुत मुश्किल होता है अपने आप को बांधे रखना| हर दूसरे दिन कहीं भाग जाने का मन करता है और हर दिन अपना मन मार के कुर्सी पे बैठ कर पढ़ना चुनना होता है| हमारे इसी तरह का छोटे-छोटे चुनाव, हमें हमारे गंतव्य के ओर पहुँचा देते है| कन्धा नहीं होता न कोई साथ देता है| तानों और तनाव से भरा होता है यह युद्ध और हर हाल में हमें यह युद्ध लड़ना होता है स्वयं के लिए| बड़े-बड़े युद्ध अक़्सर शांत  कमरों में अकेले लड़े जाते...

"Aligarh:The City Of Belonging"

I remember with shivering hands and legs, landed in the city and hugged me like a stranger turned out to be a childhood friend. It was July 7, 2019; and I walked down the Aligarh Junction. The very first time I had officially left home behind. Dreams can make us leave the most loved thing in our lives. The campus of Aligarh Muslim University feels like heaven and so is life here. Being an introvert, I was having conversations with the corners of campus and letting them know the feelings I was having since I was away from home. After days, it felt like a home. I came across kind-hearted people who had stories to tell about cultures and their highs and lows. The place which witnessed the transformation of a caterpillar into a butterfly. Hostel life taught us how to be together and how to be independent. On April 10, 2023; my official journey on campus ended and so did my school life. I was night and morning apart as on this morning I was about to board the train which is the same train t...

“कमरा”

  वही छत, वही चार दीवारें, वही फ़र्श, वही किताबें, वही शांत से फ्रेम, वही खिड़कियां, वही दरवाज़ा, इन सब की आदी हो गयी हूँ पर जब लगता है कि मैं अब ऊबने लगी हूँ तो मैं कमरे की सफाई करने लग जाती हूँ| धूल की परत झाड़ते हुए मानो झड़ने लगता है ऊबना और सब कुछ अपरिचित सा मालूम पड़ता है| घर का यह कमरा मेरे हिस्से तब आया जब मुझे लगने लगा कि मेरा ख़ुदका एक कमरा होना चाहिए| कमरा मिला,कमरे को ख़ूब सजाया, अनगिनत सपने देखें और कमरे ने मुझे हँसता, रोता, खोता, टूटता देखा|  मैंने जब-जब खिड़की से झांकते हुए चाँद देखा,तब-तब मैंने कमरे में अपने भीतर की ख़ामोशी को घुलते पाया| यह कमरा ज़मीन का केवल एक मात्र टुकड़ा नहीं है इसका हर हिस्सा मानो किताब का पन्ना है जिसमें लिखा है मेरा अतीत और लिखा जा रहा है मेरा वर्तमान|  मैं जब भविष्य के बारे में सोचती हूँ तो विस्थापन का विचार मुझे अंदर तक झकझोर देता है| जीवन के दुःखों को साझा करा था इस कमरे ने, इस कमरे का वियोग कौन साझा करेगा?  किसी नए शहर में, किसी मकान में, नया-सा कमरा रहेगा जिसमें ज़रूर विस्थापन के अवशेष होंगे हालाँकि मेरी स्मृति में मेरा...

“PAIN IS JOYFUL”

The toe finger hurt by the edge, the fingers tucked in the middle of the door, the bruises over the knees, touching a hot utensil, the best friend became the best friend of someone else, not accompanied by parents to the market and not getting the toys might be the incidents which gave the very first sense of pain.  When we were children, we cried, we screamed to express the pain but as we age, pain is accompanied by silence. Nothing and no one is familiar about the ocean of pain we are drowning in. The people whom we loved, went away, and the fathomless pain they left behind. The absence feels lifeless. The goals we could not achieve became the nightmares. It keeps intimidating us for the rest of life. The living body has to go through different forms of pain throughout its life but it is not only one emotion over which we lose life. Initial classes taught us that pain is an uncountable noun because if we could measure it, the world would be facing, a new form of competition. How ...

"आख़िर में सब ठीक हो जायेगा"

क ब आता है ये आख़िर या बस एक उम्मीद का नाम है 'आख़िर|' बड़े समय तक मुझे ऐसा लगता रहा कि किसी एक दिन के इंतज़ार में, हम ज़िंदा रहते है पर असल में उस दिन के इंतज़ार में हम थोड़ा-थोड़ा, हर दिन मरते जाते है| हम जन्म से लेकर मृत्यु तक बस एक इंतज़ार रूपी बस में सवार होकर सफर तय करते है| इंतज़ार, किसी व्यक्ति का कभी तो किसी मक़ाम का और कभी किसी चीज़ का भी नहीं| इंतज़ार मानो हमारी ज़िन्दगी का निचोड़ हो| कितना एकांत होता है इंतज़ार में रहना|  कॉलेज की सीढ़ियां चढ़ते हुए, इंतज़ार करना,आख़िरी बार सीढ़ियां उतरने के लिए और पांच साल का गुज़र जाना|  नौकरी का इंतज़ार करना, दफ़्तर से घर जाने का इंतज़ार करना, कॉल का इंतज़ार करना, पिता से तारीफ़ सुनने का इंतज़ार करना, माँ के खाने का इंतज़ार करना, अच्छे जीवन का इंतज़ार करना,सुकून का,अपनों के चले जाने के बाद उनके ग़म से उभरने का और कभी अपने आप का इंतज़ार करना| हम न चाहते हुए भी इंतज़ार में रहते है| इंतज़ार की सबसे बुरी बात यह है कि हम किसी से कभी इंतज़ार साँझा नहीं कर सकते, हमें हमेशा अपने कंधो पर इंतज़ार का बोझ ढोना होता है| इंतज़ार और साँस, दोनों का एक जैसा ही रिश्ता है कोई एक थमा ...

THE ‘X’ AND THE ‘Y’

  The egg fused by sperm containing Y and X chromosomes will become a male and a female respectively. These are biologically defined genders but while growing up, you have to walk down the paths of masculinity and femininity defined by society. The male has to be rigid and the female has to be fragile. Masculinity does not mean to put others under their soles and femininity does not mean to be oppressed.  Over the years, I realized that males are overburdened with the idea of pseudo-masculinity and females are over-confident with the idea of pseudo-femininity. We forget most of the time that we run through hormones too. We can show anger, zeal, grief, and tears irrespective of gender. At present times, we complain that the opposite gender is not able to understand us. Complaining is easier than finding out why it is happening. The real reason is that we are bound by the ego of our respective genders. To understand, a male has to attain a bit of femininity and a female has ...